कोलकाता: कोलकाता में आयोजित एक छात्र सम्मेलन को संबोधित करते हुए वामपंथी वक्ता नेहा ने केंद्र की सत्ता और दक्षिणपंथी राजनीति पर कड़ा प्रहार किया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद शारीरिक चोटों और अस्वस्थता के बावजूद सम्मेलन में पहुंचीं नेहा ने कहा कि सत्ता लाठी-डंडों और हिंसा के दम पर छात्रों और वामपंथी परंपरा को कभी आत्मसमर्पण करने पर मजबूर नहीं कर सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि दिल्ली में जब भी छात्रों का खून बहेगा तो कोलकाता उसका दर्द महसूस करेगा और कोलकाता पर हमला होने पर दिल्ली डटकर खड़ी रहेगी।
'जंतर-मंतर से लेकर जादवपुर और SRFTI तक दमन की कोशिश'
सम्मेलन में अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए नेहा ने कहा कि जंतर-मंतर पर लगातार तीन दिनों तक संघर्ष करने वालों की स्थिति बेहद गंभीर रही है। उन्होंने कहा, "जिस तरह हमारे शरीर और गले पर चोट के निशान हैं, वही दर्द इस समय जादवपुर विश्वविद्यालय (JU) और सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI) भी झेल रहे हैं।" उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता के अहंकार में चूर लोग सोचते हैं कि वे छात्रों को पीटकर घुटनों पर ला देंगे, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि देश में छात्र और जनआंदोलनों को जीवित रखने वाले लोग वामपंथ की उस जुझारू परंपरा से आते हैं, जिसने वियतनाम, क्यूबा और लातिन अमेरिका के संघर्षों से प्रेरणा ली है।
'वोट का अधिकार छीनना लोकतंत्र की आत्मा की हत्या'
लोकतंत्र की अहमियत पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र महज कागज पर लिखा कोई दस्तावेज नहीं, बल्कि आजादी के सेनानियों के बलिदान पर टिका एक जीवित वादा है। इस व्यवस्था में आम जनता के पास सबसे बड़ा हथियार मताधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि छल-कपट से वोट का अधिकार छीनना सीधे तौर पर लोकतंत्र की हत्या है। उन्होंने कहा कि देश के आम लोगों ने अपने खून-पसीने से इस संविधान को सींचा है और वे इसे किसी भी हाल में लहूलुहान नहीं होने देंगे। पश्चिम बंगाल पर विशेष दबाव बनाने और SIR जैसी व्यवस्थाएं थोपने के प्रयासों पर उन्होंने कहा कि बंगाल का इतिहास हमेशा तानाशाही के खिलाफ देश का नेतृत्व करने का रहा है।
'ना डरते हैं, ना बिकते हैं—वही वामपंथ है'
भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधते हुए वक्ता ने कहा कि सत्ता पक्ष शिक्षा, रोजगार और जनसुविधाओं की राजनीति नहीं करता, बल्कि बाहुबल और डर की राजनीति पर निर्भर है। उन्होंने कहा, "वे सोचते हैं कि मीडिया, चुनाव आयोग, अदालत और पुलिस उनके प्रभाव में हैं, इसलिए उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि दुनिया में एक ऐसा तबका हमेशा रहा है जो न कभी बिका है और न कभी डरा है, और उस धारा का नाम वामपंथ है।" उत्तराखंड की पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए उन्होंने एक शेर साझा किया कि किस तरह एक छोटे और कमजोर समझे जाने वाले हाथ ने बड़े साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्वी की कलाई मरोड़ दी थी।
'अत्याचार के चंद दिन बाकी, फिर लौटेगा लोकतंत्र'
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने एकजुटता का आह्वान करते हुए कहा कि संघर्षों की यह रात जल्द समाप्त होगी। उन्होंने कहा कि देश में ऐसा माहौल दोबारा स्थापित करना होगा जहां धर्म, जाति या लिंग के आधार पर किसी भी नागरिक को दोयम दर्जे का न बनाया जाए और न ही किसी की भीड़ द्वारा हत्या की जा सके। उन्होंने 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे के साथ छात्रों और लोकतांत्रिक ताकतों से एकजुट होकर एक प्रगतिशील बंगाल और भारत के निर्माण के लिए संघर्ष जारी रखने की अपील की।