कोलकाता : भोर की पहली किरण के साथ ही वीरेंद्र कृष्ण भद्र के गूंजते हुए सुरीले मंत्रोच्चार और 'महिषासुरमर्दिनि' के पाठ के साथ पूरे पश्चिम बंगाल में महालया का पर्व उल्लास और श्रद्धा के साथ शुरू हो गया है। शनिवार की सुबह कोलकाता के ऐतिहासिक बाबूघाट से लेकर जजस घाट तक गंगा के तटों पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। पितृ पक्ष के इस अंतिम दिन यानी महालया के मौके पर हजारों की संख्या में लोगों ने नदी के तट पर पहुंचकर अपने पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति और शांति के लिए पारंपरिक विधि-विधान के साथ पितृ तर्पण किया।
घाटों पर सुरक्षा के कड़े प्रबंध और जलमार्ग पर निगरानी
महालया के दिन गंगा घाटों पर उमड़ने वाली भारी भीड़ के मद्देनजर प्रशासन की ओर से सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। बाबूघाट से लेकर अन्य प्रमुख घाटों पर पुलिस बल तैनात रहा। किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए नदी में जलमार्गों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। इसके साथ ही घाटों के आसपास यातायात को सुचारू बनाए रखने के लिए गाड़ियों की आवाजाही को नियंत्रित किया गया है, ताकि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
क्या है तर्पण का धार्मिक महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 'तर्पण' शब्द 'तृप्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'संतुष्ट करना'। भगवान, ऋषियों और पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए जल अर्पित करने की प्रक्रिया को तर्पण कहा जाता है। सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तब पितृपक्ष की शुरुआत होती है। मान्यता है कि इस काल में पूर्वज अपनी लोक छोड़कर वंशजों के घरों के पास वास करते हैं और जब सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश करते हैं, तो वे पुनः अपने लोक लौट जाते हैं। इसी अवधि के दौरान उनके निमित्त जल और तर्पण अर्पित किया जाता है।
तर्पण की विधि और नियम
शास्त्रीय विधान के अनुसार, पितृ और मातृ तर्पण के समय जल, काले तिल, चंदन, तुलसी पत्र और त्रिपत्री का उपयोग किया जाता है। सामान्य तर्पण में तिलों के स्थान पर धान या जौ का भी विधान है। यदि चंदन, तिल या जौ उपलब्ध न हो, तो कुरुक्षेत्र मंत्र पाठ करते हुए जल में केवल तुलसी का पत्ता डालकर भी तर्पण किया जा सकता है। हालांकि, पितृ तर्पण में विशेष रूप से काले तिलों का प्रयोग अनिवार्य माना गया है, जिससे पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
महालया के साथ शुरू हुआ देवी पक्ष का उत्साह
घाटों पर तर्पण के बाद अब पूरे राज्य में दुर्गा पूजा के काउंटडाउन की शुरुआत हो गई है। महालया के इस पावन पर्व के साथ ही बंगाली समुदाय का सबसे बड़ा उत्सव यानी 'देवी पक्ष' औपचारिक रूप से आरंभ हो गया है। सुबह से ही पूजा पंडालों की ओर लोगों की निगाहें टिक गई हैं और हर तरफ भक्तिमय माहौल देखने को मिल रहा है।