कोलकाता - शारदीय नवरात्रि के आगमन के साथ देशभर में मां दुर्गा की आराधना की तैयारियां तेज हो जाती हैं। इस दौरान मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पश्चिम बंगाल दुर्गा पूजा की समृद्ध परंपरा के साथ-साथ कई प्राचीन शक्तिपीठों के लिए भी प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन स्थानों का संबंध माता सती के शरीर के विभिन्न अंगों या आभूषणों से है। नवरात्रि के अवसर पर इन धामों का विशेष महत्व माना जाता है। आइए जानते हैं पश्चिम बंगाल के 12 प्रमुख शक्तिपीठों और उनसे जुड़ी मान्यताओं के बारे में।

1. कपालिनी शक्तिपीठ, तामलुक
पूर्व मेदिनीपुर जिले के तामलुक में स्थित कपालिनी मंदिर को वर्गा भीमा शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती की बाईं एड़ी गिरी थी। देवी को भीमरूपा या कपालिनी के रूप में पूजा जाता है, जबकि भगवान शिव सर्वानंद भैरव के स्वरूप में पूजित हैं। श्रद्धालु यहां शक्ति, साहस और भय से मुक्ति की कामना लेकर पहुंचते हैं।
2. रत्नावली शक्तिपीठ, हुगली
हुगली जिले में स्थित रत्नावली शक्तिपीठ को माता सती के दाएं कंधे से जुड़ा माना जाता है। यहां देवी की पूजा कुमारी या आनंदमयी नाम से की जाती है। भगवान शिव को भैरव स्वरूप में पूजा जाता है। भक्त इस धाम में सुख-शांति और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
3. किरीटेश्वरी शक्तिपीठ, मुर्शिदाबाद
मुर्शिदाबाद जिले के किरीटकोण क्षेत्र में स्थित किरीटेश्वरी मंदिर बंगाल के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में शामिल है। मान्यता है कि यहां माता सती का मुकुट गिरा था। देवी को विमला के रूप में पूजा जाता है। इस स्थान का संबंध भैरव के स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। नवरात्रि में यहां श्रद्धालु विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
4. भ्रामरी शक्तिपीठ, जलपाईगुड़ी
जलपाईगुड़ी क्षेत्र के सालबाड़ी गांव में स्थित भ्रामरी देवी मंदिर का संबंध माता सती के बाएं पैर से जोड़ा जाता है। यहां देवी भ्रामरी और भैरव ईश्वर के रूप में पूजित हैं। धार्मिक मान्यताओं में भ्रामरी को शक्ति के उग्र और रक्षक स्वरूप से जोड़ा जाता है। प्राकृतिक परिवेश के बीच स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था रखता है।
5. बहुला शक्तिपीठ, केतुग्राम
पूर्व बर्धमान जिले के केतुग्राम क्षेत्र में स्थित बहुला शक्तिपीठ के बारे में मान्यता है कि यहां माता सती का बायां हाथ गिरा था। देवी को मां बहुला और भगवान शिव को भीरुक भैरव के रूप में पूजा जाता है। भक्त यहां मनोकामना पूर्ति, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
6. उजानी शक्तिपीठ, बर्धमान
बर्धमान क्षेत्र के उजानी गांव में मंगल चंडिका शक्तिपीठ स्थित है। मान्यता के अनुसार, यहां माता सती की दाहिनी कलाई या हाथ का हिस्सा गिरा था। देवी मंगल चंडी और भगवान शिव कपिलांबर के रूप में पूजित हैं। यहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ तांत्रिक परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है।
7. वक्रेश्वर शक्तिपीठ, बीरभूम
बीरभूम जिले में स्थित वक्रेश्वर शक्तिपीठ पापहर नदी के निकट प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। मान्यता है कि यहां माता सती का भ्रूमध्य या मन गिरा था। देवी को महिषासुरमर्दिनी और भगवान शिव को वक्रनाथ के नाम से पूजा जाता है। यहां श्रद्धालु देवी की आराधना कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
8. नलहाटी शक्तिपीठ, बीरभूम
बीरभूम जिले के नलहाटी में स्थित इस शक्तिपीठ को माता सती के कंठ से संबंधित माना जाता है। यहां देवी कालिका और भैरव योगीश की पूजा की जाती है। मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं में जल अर्पित करने की एक अनूठी परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। श्रद्धालु नवरात्रि के दौरान यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
9. फुल्लारा शक्तिपीठ, लाभपुर
बीरभूम जिले में लाभपुर के पास स्थित फुल्लारा मंदिर को अट्टहास शक्तिपीठ भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती का निचला होंठ गिरा था। देवी फुल्लरा और भगवान शिव विश्वेश के रूप में पूजित हैं। मंदिर में प्राकृतिक शिला को देवी का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।
10. नंदीपुर शक्तिपीठ, सैंथिया
बीरभूम जिले के सैंथिया में स्थित नंदीपुर शक्तिपीठ का संबंध माता सती के कंठहार से जोड़ा जाता है। यहां देवी नंदिनी और भगवान शिव नंदिकेश्वर के रूप में पूजित हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार, वटवृक्ष के नीचे स्थित सिंदूर लेपित चट्टान को देवी का स्वरूप माना जाता है।
11. युगाद्या शक्तिपीठ, क्षीरग्राम
पूर्व बर्धमान जिले के क्षीरग्राम में स्थित युगाद्या शक्तिपीठ को माता सती के दाएं पैर के अंगूठे से संबंधित माना जाता है। यहां देवी युगाद्या और भगवान शिव क्षीरकंठक या क्षीरखंडक भैरव के रूप में पूजित हैं। पास में स्थित क्षीरदिघी तालाब को लेकर मान्यता है कि देवी की मूल प्रतिमा उसके जल में निवास करती है।
12. कालीघाट शक्तिपीठ, कोलकाता
कोलकाता का कालीघाट मंदिर देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में शामिल है। मान्यता है कि यहां माता सती के दाएं पैर का अंगूठा गिरा था। देवी को कालिका और भगवान शिव को नकुलेश्वर भैरव के रूप में पूजा जाता है। मां काली की विशिष्ट प्रतिमा और मंदिर की प्राचीन परंपरा इसे श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व का केंद्र बनाती है। यहां सामान्य पूजा के साथ तांत्रिक परंपराओं का भी ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भ मिलता है।
कांची देवगर्भ शक्तिपीठ, बीरभूम
बोलपुर के पास कंकालिता मंदिर को कांची देवगर्भ शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती की कमर या कंकाल का हिस्सा गिरा था। देवी देवगर्भा और भगवान शिव रुरु भैरव के रूप में पूजित हैं। मंदिर के आसपास की धार्मिक परंपराओं में साधना और तांत्रिक अनुष्ठानों का भी उल्लेख मिलता है।

नवरात्रि में क्यों खास हैं ये शक्तिपीठ?
पश्चिम बंगाल के ये मंदिर धार्मिक आस्था, स्थानीय परंपराओं और देवी उपासना की विविधता को दर्शाते हैं। नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु मां के दर्शन, पूजा और विशेष अनुष्ठानों के लिए इन स्थलों पर पहुंचते हैं। हालांकि, शक्तिपीठों की संख्या, स्थान और माता सती के अंगों से जुड़ी मान्यताओं के विवरण अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और ग्रंथों में भिन्न हो सकते हैं। यात्रा की योजना बनाने से पहले मंदिर के दर्शन समय और स्थानीय व्यवस्था की जानकारी लेना उपयोगी रहेगा।
