कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) पद को लेकर चल रहे कानूनी और राजनीतिक विवाद पर कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। जस्टिस शंपा सरकार और जस्टिस अजय कुमार गुप्ता की पीठ ने विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) रथीन बोस द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता नियुक्त किए जाने के फैसले पर तत्काल कोई अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि स्पीकर का यह निर्णय पूरी तरह से 'अस्थायी' (Provisional) है। अदालत ने मामले की सुनवाई कर रही सिंगल बेंच को निर्देश दिया है कि वह आगामी दो महीनों के भीतर इस याचिका का अंतिम रूप से निपटारा करे। इसका अर्थ यह है कि अगले दो महीने तक ऋतब्रत बनर्जी इस संवैधानिक पद पर बने रहेंगे, जिसके बाद अदालत के अंतिम फैसले से उनकी कुर्सी का भविष्य तय होगा।
शोभनदेव चट्टोपाध्याय की याचिका और स्पीकर की भूमिका पर सवाल
विधानसभा चुनाव के बाद 80 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ओर से पार्टी चेयरपर्सन ममता बनर्जी ने वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को संसदीय दल का नेता और नेता प्रतिपक्ष मनोनीत किया था। 9 मई को इस संबंध में स्पीकर को पत्र भेजा गया था। आरोप है कि स्पीकर ने उस पत्र पर कोई निर्णय नहीं लिया।
इसी दौरान, पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने 58 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए खुद को नेता प्रतिपक्ष के रूप में प्रस्तुत किया, जिसे स्पीकर ने स्वीकार कर लिया। इसके खिलाफ शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने हाईकोर्ट का रुख किया था।सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) निर्णय लेने से पहले स्पीकर को दोनों गुटों को बुलाकर उनकी दलीलें और पार्टी का संविधान देखना चाहिए था।
अदालत का निर्देश: 2 महीने में सिंगल बेंच करेगी अंतिम फैसला
सुनवाई के दौरान स्पीकर रथीन बोस के वकील ने तर्क दिया कि बहुसंख्यक विधायकों (58 सदस्यों) के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव मिलने के बाद अध्यक्ष के पास उसे स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। वहीं, टीएमसी सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी की निष्पक्ष संसदीय भूमिका का उल्लेख करते हुए प्रक्रियागत नियमों पर बल दिया।डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा कि सदन की कार्यवाही में कोई व्यवधान न आए, इसलिए फिलहाल स्थिति को बरकरार रखा जा रहा है। अब सिंगल बेंच को दोनों पक्षों के हलफनामों और कानूनी तर्कों के आधार पर दो महीने के भीतर यह तय करना होगा कि ऋतब्रत बनर्जी की नियुक्ति वैध है या नहीं।