कोलकाता: कोलकाता की दुर्गापूजा आज पूरी दुनिया में अपनी परंपरा, संस्कृति और कला के लिए मशहूर है। शहर में एक ओर थीम पूजा और भव्य पंडालों की चमक दिखाई देती है, तो दूसरी ओर कोलकाता की दुर्गापूजा की जड़ें आज भी पुराने राजबाड़ी और बनर्जी परिवारों की पारंपरिक पूजा में मौजूद हैं। करीब ढाई सौ साल पहले शुरू हुई ऐसी ही एक ऐतिहासिक परंपरा आज भी उत्तर कोलकाता के शोभाबाजार राजबाड़ी में जारी है।
सिर्फ पूजा नहीं, इतिहास और संस्कृति की पहचान
कोलकाता नगर निगम से हेरिटेज बिल्डिंग का दर्जा प्राप्त शोभाबाजार राजबाड़ी की दुर्गापूजा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह बंगाल के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। सदियों पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ आज भी यहां मां दुर्गा की आराधना की जाती है।
1757 में राजा नवकृष्ण देव ने शुरू की थी पूजा
शोभाबाजार राजबाड़ी में दुर्गापूजा की शुरुआत साल 1757 में राजा नवकृष्ण देव ने की थी। उस दौर में कोलकाता में मुख्य रूप से जमींदार और अभिजात परिवारों के घरों में ही दुर्गापूजा का आयोजन होता था। शोभाबाजार राजबाड़ी की पूजा जल्द ही अपने भव्य आयोजन, अतिथि सत्कार और सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण कोलकाता के बाबू समाज में खास पहचान बनाने लगी।
रॉबर्ट क्लाइव और वॉरेन हेस्टिंग्स के पहुंचने की भी चर्चा
शोभाबाजार राजबाड़ी की दुर्गापूजा से कई ऐतिहासिक किस्से जुड़े हुए हैं। लोककथाओं और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, ब्रिटिश शासन के शुरुआती दौर में रॉबर्ट क्लाइव और वॉरेन हेस्टिंग्स जैसे ब्रिटिश अधिकारी भी इस पूजा में शामिल हुए थे। इसी वजह से राजबाड़ी की पूजा का इतिहास बंगाल के औपनिवेशिक दौर से भी जुड़ जाता है।
आज भी उसी परंपरा से बनती है मां दुर्गा की प्रतिमा
शोभाबाजार राजबाड़ी की पूजा की सबसे खास परंपराओं में से एक है यहां प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया। राजबाड़ी के ठाकुरदालान में ही मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार की जाती है। देवी के चेहरे का एक विशेष सांचा राजबाड़ी के संदूक में सुरक्षित रखा गया है और हर साल उसी सांचे के आधार पर प्रतिमा तैयार की जाती है।
एकचाला प्रतिमा और डाक की सजावट है खास पहचान
यहां मां दुर्गा की एकचाला प्रतिमा बनाई जाती है। देवी के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और गणेश भी विराजमान होते हैं। पारंपरिक डाक की सजावट और पारंपरिक आभूषणों से मां दुर्गा का श्रृंगार किया जाता है। प्रतिमा का यह पारंपरिक स्वरूप आज भी राजबाड़ी की पूजा को अलग पहचान देता है।
ठाकुरदालान और नाटमंदिर में दिखती है भव्यता
शोभाबाजार राजबाड़ी का विशाल ठाकुरदालान और खुला नाटमंदिर यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण हैं। दुर्गापूजा के दौरान रोशनी और सजावट से पूरा राजबाड़ी परिसर एक अलग ही रूप में नजर आता है। पूजा के चारों दिनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं।
नृत्य समारोह से भी जुड़ा है राजबाड़ी का इतिहास
शोभाबाजार राजबाड़ी की पूजा का संबंध नृत्य समारोहों की पुरानी परंपरा से भी रहा है। लोकमान्यता है कि देवी दुर्गा रातभर राजबाड़ी में नृत्य देखती थीं। राजबाड़ी से जुड़े विवरणों के अनुसार, पूजा की शुरुआत के दौर में बंगाल में अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ रहा था। उस समय राजा नवकृष्ण देव देश के अलग-अलग हिस्सों से नर्तकियों को बुलाकर राजबाड़ी में नृत्य समारोह आयोजित करवाते थे। बाद में यह भी पूजा की परंपरा का हिस्सा बन गया।
कृष्ण नवमी से शुरू होता है पूजा का विधान
शोभाबाजार राजबाड़ी में कृष्ण नवमी से ही पूजा की शुरुआत मानी जाती है। हालांकि इस समय मिट्टी की प्रतिमा की पूजा नहीं होती। घट स्थापना के जरिए देवी का आह्वान किया जाता है। इसके बाद प्रतिदिन स्तोत्र पाठ और वेद पाठ की परंपरा निभाई जाती है। षष्ठी से प्रतिमा के साथ मुख्य दुर्गापूजा शुरू होती है।
संधिपूजा और नवमी के बलिदान की परंपरा बरकरार
समय बदलने के बावजूद शोभाबाजार राजबाड़ी में पूजा के कई पुराने नियम और अनुष्ठान आज भी कायम हैं। संधिपूजा, नवमी का बलिदान और हवन जैसी परंपराएं निर्धारित विधि-विधान के अनुसार निभाई जाती हैं। यही परंपराएं इस पूजा को दूसरी दुर्गापूजाओं से अलग बनाती हैं।
नीलकंठ पक्षी की जगह अब प्रतीकात्मक पक्षी
विसर्जन के दौरान भी शोभाबाजार राजबाड़ी की अपनी खास परंपरा है। एक समय देवी के कैलाश लौटने का संदेश देने के लिए असली नीलकंठ पक्षी उड़ाया जाता था। हालांकि कानूनी पाबंदियों के चलते अब इसकी जगह गैस गुब्बारे की मदद से सौर ऊर्जा से चलने वाला प्रतीकात्मक पक्षी उड़ाया जाता है।
करीब 40 बेयरे कंधे पर लेकर जाते हैं मां की प्रतिमा
विसर्जन के दिन राजबाड़ी से मां दुर्गा की प्रतिमा को करीब 40 बेयरे कंधे पर लेकर जाते हैं। इसके बाद प्रतिमा को दो नावों के बीच रखकर गंगा के बीच तक ले जाया जाता है। गंगा के बीच पहुंचने के बाद दोनों नावें धीरे-धीरे विपरीत दिशा में चली जाती हैं और मां दुर्गा की प्रतिमा गंगा में विसर्जित की जाती है।
थीम पूजा की चमक के बीच भी कायम है अपनी अलग पहचान
आज जब कोलकाता में थीम पूजा और भव्य पंडाल लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं, तब भी शोभाबाजार राजबाड़ी की दुर्गापूजा अपनी पारंपरिक पहचान के साथ कायम है। यहां आधुनिकता से ज्यादा महत्व इतिहास, रीति-रिवाज और पारिवारिक परंपराओं को दिया जाता है।
कोलकाता की दुर्गापूजा के इतिहास का जीवंत अध्याय
शोभाबाजार राजबाड़ी की दुर्गापूजा सिर्फ देवी आराधना का उत्सव नहीं है। इसके साथ कोलकाता का इतिहास, बंगाल का सामाजिक बदलाव, बाबू संस्कृति और करीब ढाई सौ साल पुरानी विरासत जुड़ी हुई है। यही वजह है कि आज भी शोभाबाजार राजबाड़ी की दुर्गापूजा को कोलकाता के दुर्गोत्सव के इतिहास का एक जीवंत अध्याय माना जाता है।