कोलकाता: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विवाद के बीच चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद का मामला सामने आया है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी के बीच SIR से जुड़े कई फैसलों को लेकर मतभिन्नता थी। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि करीब 10 महीनों के दौरान दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 बार लिखित रूप में अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं।
SIR के फैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्ति
रिपोर्ट के मुताबिक मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने, दोबारा शामिल करने और मतदाता संबंधी डेटा के तकनीकी प्रबंधन समेत कई मुद्दों पर संधू और जोशी ने आपत्ति जताई थी। उनका कथित तौर पर कहना था कि कुछ महत्वपूर्ण फैसले पर्याप्त चर्चा के बिना लागू किए गए।
वोटर डेटा के केंद्रीकरण पर भी उठे सवाल
SIR के तहत मतदाताओं के डेटा के सत्यापन और प्रबंधन को लेकर भी कथित तौर पर सवाल उठाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने राज्य स्तर के अधिकारियों की भूमिका के बीच दिल्ली केंद्रित व्यवस्था को लेकर चिंता जताई थी। उनके अनुसार, प्रशासनिक स्तर पर लिए गए फैसलों और केंद्रीय सॉफ्टवेयर की प्रक्रिया के बीच अंतर होने की स्थिति में समस्या पैदा हो सकती है। वोटर डेटा से जुड़े सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता और कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए जाने का दावा किया गया है।
कैबिनेट सचिव के सामने भी कथित तौर पर रखी गई आपत्ति
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस मुद्दे से जुड़ी अपनी चिंताओं को कैबिनेट सचिव के सामने भी रखा था। सुखबीर सिंह संधू ने कुछ कदमों को कथित तौर पर ‘अनधिकृत’ और ‘अवैध’ बताया था।
Form 6 में बदलाव को लेकर भी विवाद
नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में बदलाव का मुद्दा भी रिपोर्ट में सामने आया है। दावा किया गया है कि फॉर्म में माता-पिता और दादा-दादी से जुड़ी जानकारी मांगे जाने को लेकर विवेक जोशी ने सवाल उठाए थे। वहीं, सुखबीर सिंह संधू ने कथित तौर पर इस बदलाव की कानूनी वैधता पर सवाल उठाया। रिपोर्ट के मुताबिक, 13 अगस्त के एक दस्तावेज में इस बदलाव को ‘अनधिकृत’ और ‘अवैध’ बताया गया था।
38 लाख आवेदनों को लेकर भी सवाल
चुनाव आयोग की ओर से अदालत में दी गई जानकारी के अनुसार करीब 38 लाख आवेदन ट्रिब्यूनल के सामने लंबित बताए गए हैं। इनमें करीब 22 लाख 21 हजार आवेदन ऐसे लोगों के हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से बाहर हो गए और वे नाम बहाल कराने की मांग कर रहे हैं। वहीं करीब 16 लाख 10 हजार आवेदन मतदाता सूची से नाम हटाने से जुड़े बताए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सुखबीर सिंह संधू ने इन आवेदनों को लेकर सवाल उठाया था कि इन्हें किसने दाखिल किया और चुनाव आयोग के अन्य सदस्यों को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई। विवेक जोशी की ओर से पूरी प्रक्रिया के ऑडिट का सुझाव दिए जाने का भी दावा किया गया है।
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी चर्चा में
SIR की तकनीकी प्रक्रिया को लेकर गोवा का एक मामला भी रिपोर्ट में सामने आया है। दावा किया गया है कि सॉफ्टवेयर से जुड़ी समस्या के कारण 97 योग्य मतदाताओं को वोट डालने में परेशानी हुई। रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित मतदाताओं ने जरूरी दस्तावेज स्थानीय Electoral Registration Officer के सामने जमा किए थे और उन्हें योग्य मतदाता माना गया था। हालांकि, कथित तौर पर केंद्रीय सॉफ्टवेयर ने स्थानीय स्तर पर लिए गए फैसले को स्वीकार नहीं किया।

अभिषेक बनर्जी ने की CEC को हटाने की मांग
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने सोशल मीडिया के जरिए प्रतिक्रिया दी। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल हटाने और अदालत की निगरानी में जांच कराने की मांग की।अभिषेक बनर्जी का आरोप है कि अगर किसी राजनीतिक दल को कथित तौर पर फायदा पहुंचाने के लिए लाखों मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित किया गया है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर मामला है। उन्होंने जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी अभिषेक ने उठाया सवाल
अभिषेक बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद INDIA गठबंधन के विपक्षी दलों ने मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को पत्र लिखकर चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर अपनी चिंताएं रखी थीं। अभिषेक का दावा है कि इन आरोपों की अपेक्षित तरीके से जांच नहीं हुई। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़े गंभीर सवाल बार-बार उठने के बावजूद अगर उन पर पर्याप्त सुनवाई या समीक्षा नहीं होती है, तो संस्थागत निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले में कोई कदम उठाएगी या नहीं।
SIR पर TMC की पहले से आपत्ति
तृणमूल कांग्रेस शुरुआत से ही पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर आपत्ति जताती रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के अन्य नेताओं ने मतदाता सूची से वास्तविक मतदाताओं के नाम हटने की आशंका को लेकर सवाल उठाए हैं। अब चुनाव आयोग के दो सदस्यों की कथित लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई है।
SIR पर राजनीतिक और संवैधानिक बहस तेज
SIR को लेकर सामने आई रिपोर्ट ने मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया, चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था और केंद्रीय तकनीकी प्रणाली की भूमिका पर बहस को बढ़ा दिया है। हालांकि, चुनाव आयोग के सदस्यों की कथित आपत्तियों और रिपोर्ट में किए गए दावों पर संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया इस पूरे विवाद के संदर्भ में महत्वपूर्ण होगी।