कोलकाता: बांग्ला साहित्य के चर्चित कवि सुकांत भट्टाचार्य की जन्म शताब्दी के मौके पर उनकी रचनाओं को स्कूल पाठ्यक्रम में फिर से शामिल करने की मांग उठी है। पश्चिम बंगाल गणतांत्रिक लेखक शिल्पी संघ ने राज्य सरकार को पत्र भेजकर माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर के बांग्ला पाठ्यक्रम में सुकांत की कविताओं को जगह देने का आग्रह किया है। संघ ने विशेष रूप से ‘अठारो बछोर बोयोस’ और ‘रवींद्रनाथेर प्रति’ जैसी रचनाओं को पाठ्यक्रम में दोबारा शामिल करने की अपील की है। संगठन का कहना है कि सुकांत की रचनाएं सामाजिक चेतना, युवा मन और शोषण के खिलाफ आवाज को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेखक संघ की ओर से पाठ्यक्रम में इन रचनाओं को हटाए जाने को लेकर पूर्ववर्ती पाठ्यक्रम व्यवस्था पर सवाल भी उठाए गए हैं। हालांकि, अंतिम तौर पर किन रचनाओं को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा, इसका फैसला विशेषज्ञ समिति पर छोड़ने की बात संगठन ने कही है।
पाठ्यक्रम से सुकांत की रचनाएं हटाए जाने पर उठे सवाल
पश्चिम बंगाल गणतांत्रिक लेखक शिल्पी संघ के अनुसार, वर्ष 2014 के आसपास हुए पाठ्यक्रम बदलाव के दौरान सुकांत भट्टाचार्य की कुछ प्रमुख रचनाओं को स्कूली पाठ्यक्रम से हटा दिया गया था। संगठन का कहना है कि इसके बाद स्कूली छात्रों के लिए सुकांत के साहित्य से नियमित रूप से परिचित होने का अवसर सीमित हुआ। संघ के मुताबिक, पहले माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को उनकी कविताओं के जरिए सामाजिक असमानता, युवा चेतना और समकालीन समाज से जुड़े सवालों को समझने का अवसर मिलता था। संगठन का दावा है कि बाद में पाठ्यक्रम में हुए बदलावों के बावजूद इन रचनाओं को फिर से शामिल नहीं किया गया। वर्ष 2024 में उच्च माध्यमिक स्तर पर सेमेस्टर प्रणाली लागू होने के बाद भी इस मुद्दे पर पुनर्विचार नहीं हुआ, ऐसा लेखक संघ का कहना है।
पवित्र सरकार और रजत बनर्जी ने मुख्यमंत्री को भेजा पत्र
संगठन के राज्य अध्यक्ष और भाषाविद पवित्र सरकार तथा महासचिव रजत बनर्जी ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में सुकांत भट्टाचार्य की रचनाओं को पाठ्यक्रम में फिर से शामिल करने की मांग की है। पत्र में कहा गया है कि वर्ष 2026 कवि की जन्म शताब्दी का वर्ष है। ऐसे अवसर पर उनकी साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए स्कूल पाठ्यक्रम में उन्हें उचित स्थान दिया जाना चाहिए। लेखक संघ का कहना है कि सुकांत की साहित्यिक पहचान को किसी एक राजनीतिक विचारधारा तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। संगठन के मुताबिक, वह बांग्ला भाषा और साहित्य के महत्वपूर्ण कवि हैं और उनकी रचनाओं का अध्ययन विद्यार्थियों को साहित्य के साथ-साथ समाज और समय को समझने में भी मदद कर सकता है। संघ ने यह भी स्पष्ट किया है कि पाठ्यक्रम में सुकांत की कौन-सी रचना शामिल की जाए, इसका निर्णय साहित्य और शिक्षा के विशेषज्ञ कर सकते हैं। मुख्य मांग यह है कि उनकी रचनाओं को पाठ्यक्रम में फिर से स्थान मिले।
पाठ्यक्रम की समीक्षा के बीच उठी मांग
राज्य में स्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम की समीक्षा और उसमें आवश्यक बदलाव की प्रक्रिया के बीच लेखक संघ ने यह मांग उठाई है। संगठन का मानना है कि पाठ्यक्रम तैयार करते समय बांग्ला साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों और प्रमुख साहित्यकारों की रचनाओं को विद्यार्थियों तक पहुंचाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। शिक्षा क्षेत्र में पाठ्यक्रम में साहित्यिक रचनाओं के चयन को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे में सुकांत की रचनाओं को दोबारा शामिल करने की मांग भी इसी व्यापक पाठ्यक्रम समीक्षा के संदर्भ में देखी जा रही है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और संबंधित पाठ्यक्रम विशेषज्ञ समिति लेखक संघ की मांग पर क्या निर्णय लेते हैं और सुकांत भट्टाचार्य की कौन-कौन सी रचनाओं को आगामी पाठ्यक्रम में जगह मिलती है।