कोलकाता: सहित पूरे पश्चिम बंगाल के दुर्गा पूजा पंडालों के बाहर लाल कपड़े के ढांचे में लगने वाले वामपंथियों के बुक स्टॉल एक पुरानी परंपरा रहे हैं। लेकिन साल 2026 के इस दुर्गा उत्सव में इस परंपरा को लेकर राज्य की राजनीति में तगड़ा घमासान शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की हालिया टिप्पणी के बाद, एंटालि के कामारडांगा साधारण দুর্গোৎসব समिति (Kamardanga Saradhana Durgotsab Committee) ने पंडाल के पास वामपंथी बुक स्टॉल लगाने पर सीधे तौर पर रोक लगाने की चेतावनी दी है। इसके जवाब में वाम मोर्चे ने भी मोर्चा खोल दिया है, जिससे इलाके में होर्डिंग युद्ध छिड़ गया है।
मुख्यमंत्री का निर्देश और एंटालि में 'वाम वध' का पोस्टर वार
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने हाल ही में निर्देश दिया था कि पूजा पंडाल परिसर में वामपंथियों के स्टॉल पर 'শারদোৎসব' (शारদোৎসব) की जगह स्पष्ट रूप से 'दुर्गापूजा' लिखा जाना चाहिए, अन्यथा अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि इन स्टॉलों पर कार्ल मार्क्स और लेनिन की किताबें तो मिलती थीं, लेकिन स्वामी विवेकानंद या भारत सेवाश्रम संघ के प्रकाशनों को जगह नहीं दी जाती थी। इस चेतावनी को आगे बढ़ाते हुए एंटालि की पूजा कमिटी ने इस बार 'हिंदू सनातन राष्ट्र' थीम के तहत पंडाल के पास वामपंथी बुक स्टॉल न लगने देने का ऐलान किया है। इसके विरोध में एजेसी बोस रोड से अलিমুদ্দিন स्ट्रीट के पास 'वाम वध' के होर्डिंग लगाए गए, जिसके जवाब में वामपंथियों ने भी हिटलर के दौर का हवाला देते हुए पलटवार वाले होर्डिंग टांग दिए हैं।
सीपीआई(एम) का दावा, स्टॉल लगाने के लिए अनुमति जरूरी नहीं
वाम नेतृत्व का कहना है कि इस तरह के बुक स्टॉल लगाने के लिए हमेशा पूजा कमिटी की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है। सीपीआई(एम) नेताओं के मुताबिक, एंटालि के 1 नंबर शील लेन वाला स्टॉल मुख्य पूजा पंडाल से करीब 200 मीटर दूर लगाया जाता है, जिसे पार्टी अपने स्तर पर करती है। इस वर्ष के स्टॉल के लिए पुलिस और कोलकाता नगर निगम के संबंधित विभागों को पहले ही पत्र लिखकर सूचित कर दिया गया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह जनता के समर्थन और प्रशासनिक नियमों के तहत किया जा रहा है, इसलिए इसे रोका नहीं जा सकता।

वैचारिक बहस और स्वामी विवेकानंद की किताबों पर जोर
विवाद के बीच सीपीआई(एम) नेताओं ने सफाई दी है कि उनके स्टॉलों पर हमेशा से स्वामी विवेकानंद और अन्य दार्शनिकों की प्रामाणिक किताबें उपलब्ध रही हैं। पार्टी इस बार भी 'मार्क्सवादियों के दृष्टिकोण में स्वामी विवेकानंद' और ईएमएस नम्बूदिपाद की 'आदि शंकराचार्य व अन्य प्रसंग' जैसी महत्वपूर्ण किताबों के साथ-साथ सांप्रदायिक सौहार्द से जुड़ी पुस्तकों को बड़े पैमाने पर पुनर्मुद्रित कर रही है। वाम नेताओं का कहना है कि यदि पूजा कमिटी के पदाधिकारी स्टॉल पर आते हैं, तो उनका स्वागत स्वामी विवेकानंद की पुस्तकें भेंट कर किया जाएगा।
राजनीतिक माहौल और बदलती परिस्थितियां
राज्य में राजनीतिक समीकरण बदलने के बाद वामदल भी पूरी तरह सतर्क हो गए हैं। हालांकि, विरोधी खेमे और पूजा कमिटी का साफ कहना है कि सनातन संस्कृति के खिलाफ विचार रखने वालों को धार्मिक आयोजनों के पास जगह नहीं दी जानी चाहिए। बहरहाल, प्रशासनिक मंजूरी और राजनीतिक चेतावनियों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी देवीपक्ष में यह विवाद किस मोड़ पर पहुंचता है और क्या वामपंथी बुक स्टॉल अपनी तय जगह पर लग पाते हैं या नहीं।