कोलकाता : पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उप-चुनावों से ठीक पहले राजनीतिक और चुनावी गलियारों में चुनाव चिह्न (Election Symbol) को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले नए राजनीतिक समूह 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' (Democratic TMC) को निर्वाचन आयोग द्वारा 'खाम' (Envelope/लिफाफा) प्रतीक आवंटित किए जाने के खिलाफ इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के विधायक नौशाद सिद्दीकी सोमवार को कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गए हैं। आईएसएफ का दावा है कि यह चुनाव चिह्न उनका पंजीकृत प्रतीक रहा है और ऐन वक्त पर इसे छीनना लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है।
चुनाव आयोग से शिकायत के बाद हाईकोर्ट की शरण में पहुंचे नौशाद सिद्दीकी
भांगड़ से आईएसएफ (ISF) विधायक नौशाद सिद्दीकी ने चुनाव आयोग (EC) के फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आयोग के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराने के बाद उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
अदालत का रुख करते हुए नौशाद सिद्दीकी ने कहा:"राजनीति में यह खेल नहीं चलना चाहिए। चुनाव जितना अधिक प्रतिस्पर्धी होगा और जनता के सामने जितने ज्यादा विकल्प होंगे, लोकतांत्रिक प्रक्रिया उतनी ही मजबूत होगी। लेकिन जिस पार्टी का पहले कोई अस्तित्व ही नहीं था, उसे रातों-रात मान्यता प्राप्त पार्टी की तरह यह प्रतीक कैसे आवंटित कर दिया गया? आयोग के इस फैसले की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।"
मार्च में दर्ज कराया था प्रतीक, उप-चुनाव से पहले लगा बड़ा झटका
आईएसएफ नेतृत्व के अनुसार, चालू वर्ष में हुए विधानसभा चुनावों से पहले ही मार्च महीने में उन्होंने नियमानुसार आयोग के पास 'खाम' (Envelope) प्रतीक को पंजीकृत कराया था। इसी चिह्न के साथ आईएसएफ के उम्मीदवार पूर्व में भी चुनाव मैदान में उतरते रहे हैं और जनता के बीच उनकी पहचान इस प्रतीक से बन चुकी थी।लेकिन बीते शुक्रवार को चुनाव आयोग द्वारा तृणमूल कांग्रेस के नाम और प्रतीक पर अंतरिम रोक (Freeze) लगाने के बाद, ऋतब्रत बनर्जी के गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'खाम' प्रतीक आवंटित कर दिया गया। इसके चलते आईएसएफ से यह चुनाव चिह्न अचानक हाथ से निकलता दिख रहा है।
'मुक्त प्रतीक' और नियमों के पेंच में फंसी ISF की दावेदारी
निर्वाचन आयोग के मौजूदा नियमों के अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल को स्थायी रूप से पंजीकृत/संरक्षित चुनाव चिह्न (Reserved Symbol) प्राप्त करने के लिए राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा हासिल करना जरूरी होता है। इसके लिए चुनावों में कम से कम 6 प्रतिशत वोट और 2 सीटें, या कुल सीटों का 3 प्रतिशत हासिल करना अनिवार्य है।चूंकि आईएसएफ को अभी तक आधिकारिक रूप से राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दल का दर्जा नहीं मिला है, इसलिए आयोग के दस्तावेजों में उसे निर्दलीय/गैर-मान्यता प्राप्त दल की श्रेणी में रखा जाता है। इसी तकनीकी नियम का हवाला देकर आयोग ने 'खाम' प्रतीक ऋतब्रत बनर्जी के गुट को आवंटित कर दिया और आईएसएफ को वैकल्पिक प्रतीकों (जैसे अलमारी) की श्रेणी में स्थानांतरित कर दिया।
'फ्री वोट' बटोरने की साजिश का आरोप, निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पर उठाए सवाल
नौशाद सिद्दीकी का आरोप है कि चुनाव आयोग का यह कदम विपक्षी वोटों को भ्रमित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।उन्होंने तर्क दिया कि 'खाम' चिह्न को आईएसएफ के समर्थक और मतदाता अच्छी तरह पहचानते हैं। उप-चुनाव के बिल्कुल अंतिम क्षणों में प्रतीक बदलने से मतदाता भ्रमित होंगे और बिना किसी मेहनत के ऋतब्रत बनर्जी की नई पार्टी को आईएसएफ के समर्थकों के वोट मिलने का खतरा बना रहेगा।
6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर में उप-चुनाव, फंसा कानूनी दांव-पेच
पश्चिम बंगाल की दो हाई-प्रोफाइल सीटों—नंदीग्राम और रेजीनगर में आगामी 6 अक्टूबर को मतदान होना है। आईएसएफ ने नंदीग्राम सीट से अपना प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारा है, जहां ऋतब्रत बनर्जी की डेमोक्रेटिक टीएमसी भी चुनाव लड़ रही है।एक ही चुनाव में दो अलग-अलग दलों द्वारा एक ही प्रतीक का इस्तेमाल असंभव होने के कारण आईएसएफ के सामने भारी संकट खड़ा हो गया है।
हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी सभी राजनीतिक दलों की निगाहें
एक तरफ जहां तृणमूल कांग्रेस का नाम और 'जोड़ाफूल' (Grass and Twin-flower) प्रतीक फ्रीज होने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, वहीं दूसरी ओर 'खाम' प्रतीक का विवाद अब कलकत्ता हाईकोर्ट के पाले में है।कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट इस मामले में चुनाव आयोग की आवंटन प्रक्रिया और आईएसएफ की पूर्व पंजीकरण दलीलों की समीक्षा करेगा। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अदालत उप-चुनावों से ठीक पहले 'खाम' प्रतीक के इस विवाद पर क्या रुख अपनाती है।