कोलकाता: कोलकाता में नवजात बच्चों में जन्मजात सुनने की समस्या की जल्द पहचान और इलाज के लिए नई पहल शुरू की जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, देश में औसतन हर एक हजार नवजात बच्चों में करीब 9 बच्चों में जन्मजात सुनने की समस्या पाई जाती है। इनमें लगभग 4 बच्चों की स्थिति गंभीर हो सकती है। समय पर जांच और उपचार मिलने से ऐसे बच्चों के विकास और शिक्षा में काफी मदद मिल सकती है। इसी उद्देश्य से अब पश्चिम बंगाल में नवजात बच्चों की सुनने की क्षमता की जांच को लेकर विशेष अभियान शुरू किया जा रहा है।
जन्मजात बहरेपन पर रिसर्च, 1000 में करीब 9 नवजात प्रभावित
विशेषज्ञों के अनुसार, जन्मजात सुनने की समस्या बच्चों के शुरुआती विकास को प्रभावित कर सकती है। देश में औसतन हर एक हजार नवजात बच्चों में करीब 9 बच्चों में सुनने से जुड़ी समस्या सामने आती है। इनमें लगभग 4 बच्चों में यह समस्या गंभीर स्तर की हो सकती है। ऐसे मामलों में अगर समय रहते बीमारी की पहचान नहीं हो पाती, तो बच्चे के बोलने, सीखने और पढ़ाई पर भी इसका असर पड़ सकता है। सीके बिड़ला हॉस्पिटल्स-सीएमआरआइ के ईएनटी एवं कॉक्लियर इंप्लांट सर्जन डॉ. एनवीके मोहन ने इस बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में सुनने की समस्या का खतरा और अधिक होता है। ऐसे बच्चों में प्रति एक हजार पर करीब 50 बच्चों में सुनने की समस्या पाई जा सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती अवस्था में समस्या की पहचान होने पर उचित उपचार से बच्चे के विकास में काफी सुधार संभव है।
सौमिता प्रमाणिक बनीं मिसाल, कॉक्लियर इंप्लांट के बाद NEET में हासिल की सफलता
डॉक्टरों ने सुनने की समस्या की समय पर पहचान और इलाज के महत्व को समझाने के लिए दक्षिण 24 परगना के जयनगर की रहने वाली सौमिता प्रमाणिक का उदाहरण दिया। परिवार को जब सौमिता करीब छह महीने की थीं, तब पता चला कि वह सुन नहीं पाती हैं। इसके बाद उन्हें श्रवण यंत्र लगाया गया, लेकिन उससे अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। बाद में डॉक्टरों की सलाह पर उनका कॉक्लियर इंप्लांट किया गया। उपचार के बाद सौमिता ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और आगे बढ़ती गईं। उन्होंने अखिल भारतीय NEET परीक्षा में 2191वीं रैंक हासिल की। वर्तमान में वह एसएसकेएम (पीजी) अस्पताल में MBBS की पढ़ाई कर रही हैं। शुक्रवार को राज्य के खेल एवं युवा कल्याण मंत्री इंद्रनील खां ने सौमिता को सम्मानित किया। उनका उदाहरण यह बताता है कि समय पर समस्या की पहचान और सही उपचार मिलने पर बच्चे अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ सकते हैं।
‘उज्ज्वल शैशव’ परियोजना की शुरुआत, गांव-गांव होगी जांच
नवजात बच्चों में सुनने की समस्या की जल्द पहचान के उद्देश्य से अब ‘उज्ज्वल शैशव’ नाम से नई परियोजना शुरू की जा रही है। इस पहल में सीएमआरआई अस्पताल, महावीर सेवा सदन, अन्वेषा और सोसाइटी फॉर द मेनस्ट्रीम इंटीग्रेशन ऑफ द डेफ मिलकर काम करेंगे। परियोजना के तहत राज्य के अलग-अलग इलाकों में नवजात बच्चों की सुनने की क्षमता की जांच की जाएगी। इसके लिए गांव-गांव तक पहुंचने की योजना बनाई गई है, ताकि दूरदराज के इलाकों में रहने वाले परिवार भी इस सुविधा का लाभ उठा सकें। परियोजना का मुख्य उद्देश्य बच्चों में सुनने से जुड़ी समस्या की पहचान शुरुआती स्तर पर करना है। जांच के बाद जरूरत के अनुसार बच्चों को आगे के उपचार के लिए मार्गदर्शन दिया जाएगा। राज्य के खेल एवं युवा कल्याण मंत्री इंद्रनील खां ने बताया कि राज्य सरकार भी इस पहल में सहयोग करेगी।
बच्चों के समग्र विकास के लिए सुनने की क्षमता की जांच जरूरी
परियोजना के सलाहकार और केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के पूर्व सलाहकार डॉ. अरुण कुमार सिंह ने भी नवजात बच्चों की सुनने की क्षमता की जांच को जरूरी बताया। वह डॉ. बीसी राय इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड एंड फैमिली वेलफेयर में नवजात शिशु चिकित्सा विशेषज्ञ हैं। उनके अनुसार, बच्चे के समग्र विकास में सुनने की क्षमता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बच्चे का मस्तिष्क आसपास की चीजों और अलग-अलग ज्ञानेंद्रियों से मिलने वाली जानकारी के आधार पर विकसित होता है। ऐसे में सुनने की क्षमता में कमी होने पर बच्चे के सीखने और भाषा विकास पर असर पड़ सकता है। इसलिए जन्म के बाद ही बच्चों की सुनने की क्षमता की जांच करना जरूरी है। शुरुआती जांच से समस्या का पता जल्दी लगाया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर समय पर उपचार शुरू किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी पहल से बच्चों को शुरुआती उम्र में ही जरूरी चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।