केंद्रीय बजट 2026–27 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फ्यूचर्स और ऑप्शंस पर सिक्योरिटीज़ ट्रांज़ैक्शन टैक्स (STT) बढ़ाने का ऐलान किया। फ्यूचर्स पर STT 0.02% से बढ़ाकर 0.05% कर दिया गया है, जिससे सक्रिय ट्रेडर्स और डेरिवेटिव मार्केट में काम करने वालों की चिंता बढ़ गई है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब पिछले बजट में भी STT में तेज़ वृद्धि की गई थी, जिसके बाद से ट्रेडिंग लागत लगातार बढ़ रही है।
STT क्या है और इसे क्यों लगाया जाता है?
STT वह टैक्स है जो निवेशक द्वारा शेयर, इक्विटी म्यूचुअल फंड, फ्यूचर्स या ऑप्शंस खरीदने या बेचने पर लगाया जाता है। यह टैक्स ट्रेड के समय ही कट जाता है, चाहे निवेशक को लाभ हो या नुकसान। यह अक्टूबर 2004 में लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य कर चोरी पर रोक लगाना और इक्विटी व डेरिवेटिव मार्केट में टैक्स कलेक्शन को सरल बनाना था। हालांकि 2018 में सरकार ने लिस्टेड शेयरों पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स भी वापस लागू कर दिया, लेकिन STT अपनी जगह जारी रहा।
ट्रेडर्स की चिंता क्यों बढ़ रही है?
ट्रेडर्स का मानना है कि STT में बढ़ोतरी सीधे तौर पर ट्रेडिंग की लागत को बढ़ाती है। पिछले बजट में STT पर पहले ही बड़ा संशोधन किया गया था—जहाँ ऑप्शंस पर STT 0.0625% से बढ़ाकर 0.1% कर दिया गया था और फ्यूचर्स पर इसे 0.0125% से बढ़ाकर 0.02% कर दिया गया था। अब 2026 के बजट में STT को और बढ़ा दिया गया है, जिससे हाई-फ्रीक्वेंसी और एक्टिव ट्रेडर्स पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ गया है। यही नहीं, पूँजीगत लाभ कर (capital gains tax) भी लगातार बढ़ा है, जिससे निवेश की लागत और बढ़ती जा रही है।
कैपिटल गेन टैक्स में बढ़ोतरी और उसका असर
पिछले बजट में कैपिटल गेन टैक्स में बढ़ोतरी से भी निवेशक पहले से ही दबाव में थे। लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स 10% से बढ़ाकर 12.5% कर दिया गया, जबकि शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन टैक्स 15% से बढ़ाकर 20% कर दिया गया। विशेषज्ञों के अनुसार, STT के साथ-साथ बढ़ता कैपिटल गेन टैक्स इक्विटी-आधारित उत्पादों को कम आकर्षक बना सकता है, विशेषकर उन निवेशकों के लिए जो बार-बार ट्रेड करते हैं।
LTCG और STCG में क्या अंतर है?
लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स तब लगता है जब कोई निवेशक शेयरों को एक वर्ष से अधिक समय तक होल्ड करता है। इसके विपरीत, एक वर्ष से कम अवधि के निवेश पर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन (STCG) टैक्स लागू होता है। STT इन दोनों से अलग है क्योंकि यह हर ट्रेड पर तुरंत वसूला जाता है और लाभ-हानि से अप्रभावित रहता है। यही कारण है कि STT में बढ़ोतरी का सीधा असर छोटे और बड़े दोनों ट्रेडर्स पर पड़ता है।
बाज़ार पर संभावित प्रभाव और आगे की राह
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि STT की लगातार बढ़ोतरी ट्रेडिंग वॉल्यूम को प्रभावित कर सकती है, खासकर डेरिवेटिव्स सेगमेंट में। उच्च लागत के चलते छोटे ट्रेडर्स और रिटेल प्रतिभागियों की सक्रियता घटने की आशंका है। हालांकि सरकार इसके माध्यम से टैक्स कलेक्शन को मजबूत करना चाहती है, लेकिन निवेशकों का मानना है कि यह वृद्धि बाज़ार की गति और जोखिम उठाने की क्षमता को धीमा कर सकती है। अगले कुछ महीनों में यह देखने लायक होगा कि बाजार इस बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया देता है।
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