नई दिल्ली. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई ट्रांजेक्शन के लिए संशोधित फीस स्ट्रक्चर से ग्राहकों पर अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादा रिटेल कीमतों का बोझ पड़ सकता है। भले ही व्यापारियों को सीधे ये चार्ज ग्राहकों पर डालने से रोका गया हो। रिपोर्ट में प्रस्तावित मॉडल में बदलाव की मांग की गई है। रिपोर्ट का अनुमान है कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर स्ट्रक्चर से पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए सालाना लगभग 18,000 करोड़ रुपये की कमाई हो सकती है। हालांकि इसमें तर्क दिया गया है कि अपने मुनाफे को बनाए रखने के लिए बिजनेस इस अतिरिक्त खर्च को अपनी सामान्य बिक्री कीमतों में शामिल कर सकते हैं। इससे दो हजार रुपये से कम के ट्रांजेक्शन करने वाले ग्राहकों को भी इस लागत का कुछ हिस्सा उठाना पड़ सकता है।
प्रस्तावित फीस स्ट्रक्चर का विवरण
संशोधित स्ट्रक्चर के तहत दो हजार रुपये से ज्यादा के मर्चेंट पेमेंट पर 0.40 प्रतिशत तक एमडीआर लग सकता है। इसकी अधिकतम सीमा प्रति ट्रांजेक्शन 300 रुपये होगी। व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी P2P ट्रांसफर और दो हजार रुपये तक के मर्चेंट पेमेंट मुफ्त रहेंगे। कुछ जरूरी सेक्टर के ट्रांजेक्शन पर पांच रुपये की फ्लैट फीस लगेगी। जबकि कैपिटल मार्केट ट्रांजेक्शन पर 0.02 प्रतिशत का चार्ज लगेगा जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर यूपीआई को अभी प्रस्तावित एमडीआर स्ट्रक्चर के अनुसार लागू किया जाता है तो यह लोगों का भरोसा खो सकता है। लागू करने से पहले इस स्ट्रक्चर में बदलाव और इसे तर्कसंगत बनाने की जरूरत है।
राजस्व का अनुमान और आंकड़े
अगस्त 2026 के डेटा का इस्तेमाल करते हुए रिपोर्ट का अनुमान है कि मर्चेंट यूपीआई ट्रांजेक्शन की कुल वैल्यू लगभग नौ लाख करोड़ रुपये थी। इसमें से लगभग छह लाख करोड़ रुपये के पेमेंट दो हजार रुपये से ज्यादा के थे। 0.25 प्रतिशत के प्रभावी औसत एमडीआर को मानते हुए इससे हर महीने 1,500 करोड़ रुपये की कमाई का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट में क्रेडिट कार्ड स्वीकार करने वाले आउटलेट्स पर यूपीआई यूजर्स पर पहले से मौजूद बोझ की ओर भी इशारा किया गया है। इसमें अनुमान लगाया गया है कि यूपीआई डेबिट कार्ड और कैश का इस्तेमाल करने वालों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से उठाए गए क्रेडिट कार्ड मर्चेंट फीस का खर्च वित्त वर्ष 2026 में 26,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
ग्राहकों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि चूंकि व्यापारी आम तौर पर सभी पेमेंट तरीकों के लिए एक जैसी कीमतें रखते हैं इसलिए इन ग्राहकों को क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करने वालों को मिलने वाले रिवॉर्ड और फायदों का खर्च उठाना पड़ सकता है। डिजिटल पेमेंट पर अतिरिक्त चार्ज लगाने की जरूरत पर सवाल उठाते हुए रिपोर्ट ने बैंकों की कमाई का भी जिक्र किया। बैंकों ने वित्त वर्ष 2026 में करंट और सेविंग्स अकाउंट डिपॉजिट से 4.84 लाख करोड़ रुपये का नेट इंटरेस्ट मार्जिन कमाया। रिपोर्ट का तर्क है कि इस अतिरिक्त लागत को कीमतों में शामिल करने से आम ग्राहक प्रभावित होंगे।
बैंकों से योगदान की मांग
रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंकों को इस कमाई का लगभग तीन प्रतिशत यानी सालाना करीब 15,000 करोड़ रुपये यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने में योगदान देना चाहिए। इससे सिस्टम को बिना ग्राहकों पर बोझ डाले चलाया जा सकता है। प्रस्तावित स्ट्रक्चर में बदलाव की जरूरत पर जोर देते हुए रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि बिना सुधार के लागू करने से यूपीआई पर लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है। डिजिटल भुगतान की लोकप्रियता बनाए रखने के लिए फीस स्ट्रक्चर को संतुलित और तर्कसंगत बनाना आवश्यक है। ग्राहकों के हितों की रक्षा करते हुए सिस्टम की स्थिरता सुनिश्चित करने पर ध्यान देने की सलाह दी गई है।