भारत में सोने की चमक सिर्फ आभूषण तक सीमित नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक विरासत को प्रतिबिंबित करती है। आधुनिक युग में बढ़ती कीमतों के बीच यह समझना और आवश्यक हो जाता है कि आखिर इस धातु का भारत से रिश्ता इतना प्राचीन और गहरा क्यों है। भारत सोने का विशाल उपभोक्ता है, मगर उत्पादन बेहद सीमित—इस विरोधाभास के कारण ही आयात की जरूरत बढ़ती है।
प्राचीन भारतीय सभ्यताओं में सोने का प्रारंभिक इतिहास
भारत में सोने का इतिहास लगभग पाँच हजार वर्ष पुराना माना जाता है, जिसके प्रमाण हरियाणा के कुणाल और जलीलपुर जैसे स्थलों से मिलते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के समय सोने का उपयोग न केवल आभूषणों के निर्माण में बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी होता था। खुदाई में सोने के मोती, हार, कुंडल और अन्य कलात्मक वस्तुएँ इस बात का प्रमाण हैं कि उस समय सोने की प्रसंस्करण तकनीक अत्यंत विकसित थी। दक्षिण भारत के धारवाड़ क्रेटन क्षेत्र में प्राचीन खनन के अवशेष मिलना इस तथ्य को पुष्ट करता है कि भारत में सोने का खनन विश्व के सबसे पुराने प्रयासों में से एक था।
ऐतिहासिक साम्राज्यों में सोने के सिक्कों और खनन का विकास
कुषाण काल में मानकीकृत सोने के सिक्कों की शुरूआत भारतीय उपमहाद्वीप की आर्थिक उन्नति में महत्त्वपूर्ण चरण था। विम कडफिसेस द्वारा जारी किए गए सिक्कों ने क्षेत्रीय व्यापार को नई दिशा दी। गुप्त साम्राज्य के उत्कर्षकाल में सोने के सिक्कों का निर्माण कला और आर्थिक क्षमता का प्रतीक बन गया। समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त के समय में जारी किए गए विविध प्रकार के स्वर्ण सिक्के आज भी संग्रह के उत्कृष्ट नमूने माने जाते हैं। इन सिक्कों का व्यापक उपयोग यह दर्शाता है कि सोना भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीतिक शक्ति का मूल आधार था।
मध्यकालीन भारत और औपनिवेशिक शासन में सोने का विस्तार
मध्यकालीन भारत में मंदिरों में जमा स्वर्ण भंडार धार्मिक आस्था और दान संस्कृति का परिणाम थे, जिनकी मात्रा आज भी लगभग 20,000 टन मानी जाती है। मुगल काल में सोने का व्यापार और आभूषण निर्माण अपनी चरम स्थिति पर था। औपनिवेशिक शासन के दौरान अंग्रेजों ने भारत में आधुनिक खनन तकनीक को अपनाया और कर्नाटक में कोलार गोल्ड फील्ड्स (केजीएफ) जैसे बड़े केंद्र स्थापित किए। यह क्षेत्र दशकों तक भारत का प्रमुख स्वर्ण उत्पादक रहा और इसकी गहराई विश्व की अनूठी खदानों में गिनी जाती है।
स्वतंत्रता के बाद का नियंत्रणकाल और नीति परिवर्तन
आज़ादी के बाद भारतीय सरकार ने सोने के लेनदेन पर कड़ा नियंत्रण लागू किया ताकि अवैध व्यापार को रोका जा सके और विदेशी मुद्रा के अत्यधिक बहिर्वाह को नियंत्रित रखा जा सके। 1947 से 1962 तक ‘गोल्डन लॉकडाउन’ जैसा दौर रहा, जिसमें आयात-निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लागू थे। 1968 के स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम ने न केवल आयात को रोका बल्कि आभूषणों में सोने की शुद्धता को 14 कैरेट तक सीमित करने के प्रयास भी किए। हालांकि इन नीतियों ने घरेलू उत्पादन को बढ़ावा नहीं दिया, वे अंततः अवैध तस्करी को रोकने में भी पूरी तरह सफल नहीं हो सकीं।
आधुनिक युग: खदानों का बंद होना, नई खोजें और डिजिटल सोना
आर्थिक और पर्यावरणीय कठिनाइयों के कारण 2001 में केजीएफ बंद हो गई, जिसने भारत के घरेलू उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इसके बावजूद डिजिटल सोना, गोल्ड ETF और इंडियन गोल्ड कॉइन जैसी आधुनिक पहलें जनता के बीच लोकप्रिय हुईं और सोने में निवेश के लिए नए विकल्प बने। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में 700 टन अयस्क की खोज ने भारत की संभावनाओं को फिर जीवन दिया, हालांकि इस क्षेत्र में वृहद खनन अभी शुरू नहीं हुआ है। वर्तमान में कर्नाटक की हट्टी गोल्ड माइन्स भारत की एकमात्र सक्रिय खदान है, जो केवल 1.8 टन सोना प्रतिवर्ष उत्पादन करती है, जबकि देश की मांग इसके मुकाबले कई सौ गुना अधिक है।
भारत में सोने के उत्पादन और भंडार की वर्तमान स्थिति
भारत में स्वर्ण उत्पादन बेहद कम है, वर्ष 2020 में कुल उत्पादन मात्र 1.6 टन रहा। हट्टी माइंस के अतिरिक्त कोई बड़ी सक्रिय खदान नहीं है, जबकि तांबे के उप-उत्पाद के रूप में कुछ सोना गुजरात और झारखंड में निकाला जाता है। इसके विपरीत भारत की वार्षिक खपत लगभग 800 टन है, जिसके कारण भारी आयात करना अनिवार्य होता है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार देश में लगभग 51.82 करोड़ टन स्वर्ण अयस्क संभावित रूप से मौजूद है, लेकिन इनका दोहन तकनीकी, प्रशासनिक और पर्यावरणीय चुनौतियों के कारण संभव नहीं हो पाया है।
भारत सोना आयात क्यों करता है?
भारत सोने का दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, लेकिन उत्पादन क्षमता बेहद सीमित होने से मांग और आपूर्ति के बीच विशाल अंतर बना रहता है। विवाह, त्योहार, धार्मिक उपयोग, निवेश और सांस्कृतिक परंपराएँ—ये सभी सोने की मांग को लगातार बढ़ाती हैं। घरेलू खनन की कमी के कारण भारत को अपनी आवश्यकताओं का लगभग 85–90 प्रतिशत सोना आयात करना पड़ता है, जो आर्थिक दृष्टि से विदेशी मुद्रा पर बड़ा दबाव डालता है। यही कारण है कि विश्व बाजार के छोटे से उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था और घरेलू कीमतों पर दिखाई देता है।
Comments (0)