छतरपुर शहर के छत्रसाल चौराहे की रात उस समय विशेष बन गई, जब बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री बिना किसी पूर्व सूचना के कंचन स्वीट्स पहुंच गए। दुकान बंद होने की तैयारी में जुटे दुकानदार अशोक अग्रवाल के लिए यह क्षण किसी आश्चर्य से कम नहीं था। बाबा ने जैसे ही दुकान में प्रवेश किया, वातावरण में श्रद्धा और आत्मीयता का भाव स्वतः उमड़ आया।
सादगी से भरी मीठी मुलाकात
दुकान में प्रवेश करते ही बाबा ने बेहद सहज भाव से सेठ की गद्दी संभाली और पहले छेना रसगुल्ले का स्वाद लिया, फिर रसमलाई चखी। दुकानदार ने तिलक कर बाबा का सम्मान किया और माला पहनाई। बाबा ने न तो कोई औपचारिकता दिखाई और न ही किसी प्रकार की दूरी—उनका आचरण पूर्णतः सहज और अपनत्व से भरा हुआ था।
बाबा की मिठाई वाले के रूप में मनमोहक झलक
इसके बाद बाबा ने दुकानदार के बेटे को गले लगाकर आशीर्वाद दिया। अचानक ही माहौल हंसी और भावुकता से भर उठा, जब बाबा गद्दी पर बैठकर मजाकिया अंदाज में आवाज लगाने लगे—‘बर्फी ले लो… पेड़ा ले लो… लड्डू ले लो… अपने-अपने भाव से।’ इस दृश्य को देखकर दुकान में मौजूद लोग मंत्रमुग्ध हो गए। सभी को लगा मानो कोई साधु-संत नहीं, बल्कि घर का अपना सदस्य उनसे घुल-मिल रहा हो।
लोगों में उमड़ी भावनाओं की लहर
दुकानदार अशोक अग्रवाल के अनुसार, यह उनके जीवन का सौभाग्य था कि बाबा बागेश्वर आधी रात उनकी छोटी-सी दुकान पर आए। जिनसे मिलने के लिए लोग सालों प्रतीक्षा करते हैं, उनका इस तरह अचानक आ जाना सभी के लिए अविस्मरणीय रहा। लोगों ने अनुभव किया कि बाबा चाहे लाखों भक्तों के बीच हों या छोटे-से दुकानदार के साथ, उनकी सरलता कभी नहीं बदलती।
पहले भी दिखा है बाबा का यह सरल स्वरूप
यह पहला अवसर नहीं है जब बाबा बागेश्वर आमजन के बीच सहज रूप से नजर आए हों। इससे पहले भी वे कभी चाट की दुकान पर तो कभी समोसे वाले के पास अचानक पहुंचकर लोगों के साथ समय बिताते देखे गए हैं। यही सहजता उन्हें आम लोगों के दिल से जोड़ती है और उनके व्यक्तित्व को और भी विशिष्ट बनाती है।
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