बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बच्चे की पहचान, पारिवारिक इतिहास और सम्मान से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि शादी के दौरान जन्मे बच्चे के पितृत्व पर केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116 के तहत विवाह के दौरान जन्मे बच्चे के पितृत्व को लेकर मजबूत कानूनी धारणा मौजूद है। इसे खत्म करने के लिए केवल डीएनए रिपोर्ट पर्याप्त नहीं है, बल्कि पति को यह ठोस रूप से साबित करना होगा कि गर्भधारण के संभावित समय के दौरान पति-पत्नी के बीच मिलने की कोई संभावना ही नहीं थी।
डीएनए रिपोर्ट अकेले पर्याप्त नहीं
जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को लेकर कानून एक मजबूत धारणा प्रदान करता है।इस कानूनी धारणा को चुनौती देने के लिए पति को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करना होगा। उसे यह साबित करना होगा कि जिस समय बच्चा गर्भ में आया, उस दौरान पति-पत्नी के बीच किसी भी तरह का संपर्क या साथ रहने की संभावना नहीं थी।यदि ऐसा पुख्ता सबूत मौजूद नहीं है, तो केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर बच्चे की पहचान और उसके पिता के नाम पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी हवाला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अपर्णा अजेंक्य फिरोदिया बनाम अजेंक्य अरुण फिरोदिया और इवान राथिनम बनाम मिलन जोसेफ मामलों का भी हवाला दिया।कोर्ट के सामने मूल सवाल यह था कि बच्चे की पहचान और उसके पारिवारिक संबंधों को केवल जैविक पितृत्व की रिपोर्ट के आधार पर बदला जा सकता है या नहीं।
क्या है पूरा मामला?
मामला दुर्ग जिले से जुड़ा है। संबंधित व्यक्ति की शादी 5 मई 2005 को हुई थी। इसके बाद 21 सितंबर 2006 को उसकी बेटी का जन्म हुआ।बाद में पति-पत्नी ने आपसी सहमति से 15 नवंबर 2016 को तलाक ले लिया। गुजारा भत्ता से जुड़े मामले की कार्यवाही के दौरान बच्ची का डीएनए टेस्ट कराया गया। रिपोर्ट में संबंधित व्यक्ति बच्ची का जैविक पिता नहीं पाया गया।इसके बाद उसने दुर्ग फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर बच्ची के स्कूल रिकॉर्ड और सरकारी दस्तावेजों से अपना नाम हटाने की मांग की।
फैमिली कोर्ट ने मांग खारिज की थी
दुर्ग फैमिली कोर्ट ने 5 अप्रैल 2025 को पिता का नाम हटाने की मांग को खारिज कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ संबंधित व्यक्ति ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।हाईकोर्ट ने मामले में बच्चे की पहचान और उससे जुड़े कानूनी संरक्षण को महत्वपूर्ण माना और केवल डीएनए रिपोर्ट को पिता के नाम को हटाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना।
बच्चों को माता-पिता के विवाद का हथियार न बनाएं
हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में बच्चों की गरिमा और मानसिक सम्मान को भी महत्वपूर्ण बताया। कोर्ट ने कहा कि छोटी-छोटी बातों पर बच्चों की पहचान को अदालत में चुनौती देकर उन्हें परेशान नहीं किया जाना चाहिए।कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों को माता-पिता के आपसी विवाद का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। बच्चे की फैमिली हिस्ट्री उसकी पहचान और सम्मान से जुड़ी होती है और इसे केवल एक डीएनए रिपोर्ट के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।