जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में आयोजित भूमकाल स्मृति दिवस की रैली अब राजनीतिक विवाद का कारण बन गई है। रैली के दौरान प्रतिबंधित माओवादी संगठन से जुड़े कुख्यात नक्सली कमांडर माड़वी हिड़मा के नाम पर तैयार गीत बजाए जाने का वीडियो सामने आया है। वीडियो में कुछ लोग इन गीतों पर नाचते हुए दिखाई दे रहे हैं। वीडियो वायरल होते ही प्रदेश की सियासत गरमा गई है और कांग्रेस व बीजेपी के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
बताया जा रहा है कि भूमकाल दिवस के मौके पर निकली रैली में यह गीत बजाए गए। माड़वी हिड़मा, जो पीएलजीए बटालियन-1 का कमांडर माना जाता रहा है, उस पर 76 सीआरपीएफ जवानों की शहादत और झीरम घाटी हमले सहित कई बड़ी नक्सली घटनाओं में शामिल होने के आरोप रहे हैं। ऐसे में उसके नाम पर गीत बजना अब राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।
कांग्रेस का पक्ष: मुद्दा हिड़मा नहीं, जल-जंगल-जमीन का
इस मामले में कांग्रेस के पूर्व मंत्री अमरजीत भगत ने कहा कि सवाल किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का है। उनका आरोप है कि बस्तर की खनिज संपदा का दोहन हो रहा है और आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है।
भगत ने कहा,
"जो जल, जंगल, जमीन की बात करेगा, उसे समर्थन मिलेगा। जो उसे लूटेगा, उसका विरोध होगा — चाहे वह संगठन हो, कंपनी हो या सरकार।" उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जो भी अपने अधिकारों की बात करता है, उसे नक्सली करार देकर दबाने की कोशिश की जाती है।
बीजेपी का हमला: कांग्रेस की नक्सल समर्थक सोच
वहीं, बीजेपी के कैबिनेट मंत्री केदार कश्यप ने इस घटना को कांग्रेस की “नक्सल समर्थक सोच” बताया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस हमेशा नक्सलियों के प्रति नरम रुख रखती आई है और झीरम घाटी जैसी घटनाओं पर केवल औपचारिक संवेदना जताती है।
कश्यप ने आरोप लगाया,
"जब बस्तर में नक्सलवाद कमजोर हुआ है, तब कांग्रेस को तकलीफ हो रही है। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने खुले मंच से नक्सलियों का समर्थन किया है।" उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों में इस तरह के गीत बजना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे गलत संदेश जाता है।
बड़ा सवाल: सांस्कृतिक अभिव्यक्ति या महिमामंडन?
भूमकाल स्मृति दिवस आदिवासी अस्मिता और ऐतिहासिक विद्रोह की याद में मनाया जाता है। लेकिन इस बार रैली में बजाए गए गीतों ने पूरे आयोजन को विवादों के घेरे में ला दिया है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह आदिवासी परंपरा और अधिकारों की अभिव्यक्ति है, या फिर प्रतिबंधित संगठन से जुड़े व्यक्तियों का अप्रत्यक्ष महिमामंडन? राजनीतिक बयानबाजी के बीच बस्तर एक बार फिर बहस के केंद्र में है। हालांकि, क्षेत्र के लोगों की सबसे बड़ी चिंता आज भी शांति, सुरक्षा और विकास ही है।
Comments (0)