केंद्रीय बजट के दो दिन बाद ही मध्य प्रदेश सरकार ने घोषणा की कि वह चालू वित्तीय वर्ष में 5200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज ले रही है। इससे राज्य का कुल ऋण बढ़कर लगभग 4.75 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा, जो वित्त वर्ष 2025-26 के लिए घोषित 4.2 लाख करोड़ रुपये के बजट से लगभग 55,000 करोड़ रुपये अधिक है। वित्तीय स्वायत्तता पर इसका गंभीर असर पड़ेगा, क्योंकि कर्ज की तीन किस्तें जारी होने के बाद राज्य की उधारी क्षमता और सीमित हो जाएगी।
सरकार का तर्क: विकास के लिए कर्ज जरूरी
राज्य सरकार अपने बढ़ते कर्ज को उचित ठहराते हुए कह रही है कि बड़े विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारी पूंजी निवेश की जरूरत होती है। सरकार का दावा है कि भविष्य में भी बुनियादी ढांचे के विस्तार और आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए कर्ज लेना पड़ेगा, क्योंकि यह निवेश दीर्घकाल में राज्य के लिए लाभदायक साबित होगा।
कर्ज पर राजनीति: पुराने और नए दावों का टकराव
17 दिसंबर को विशेष सत्र में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने स्वयं स्वीकार किया था कि राज्य का कर्ज बजट से अधिक हो चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि इसका बड़ा हिस्सा पिछली सरकारों के समय का है। वहीं वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने कहा कि कर्ज लेना मजबूरी नहीं बल्कि विकास के लिए एक रणनीतिक आवश्यकता है। विपक्ष पहले से ही सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप लगा रहा है, जिससे यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
किन क्षेत्रों में हो रहा है कर्ज का उपयोग
सरकार का कहना है कि केंद्र और वैश्विक वित्तीय संस्थानों से लिए गए कर्ज का उपयोग पूरी तरह विकास कार्यों में किया जा रहा है। सिंचाई परियोजनाएँ, बांध, नहरें, तालाब निर्माण, ग्रामीण जल-संरचना और कुएँ जैसे बुनियादी ढांचे के विस्तार को इस धन से पूरा किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त राज्य की बिजली उत्पादन और वितरण कंपनियों को वित्तीय मजबूती देने के लिए भी उधार का इस्तेमाल किया गया है, ताकि ऊर्जा क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे।
वित्तीय दबाव और भविष्य की चुनौतियाँ
कर्ज बढ़ने का अर्थ है कि राज्य को ब्याज और किस्तों का भुगतान करने के लिए बजट का बड़ा हिस्सा अलग रखना होगा, जिससे सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों और नई परियोजनाओं के लिए उपलब्ध कोष सीमित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कर्ज वृद्धि पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो आने वाले वर्षों में वित्तीय अनुशासन बनाए रखना और अधिक कठिन हो जाएगा। विकास और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन कायम रखना मध्य प्रदेश के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
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