जबलपुर के मानस भवन सभागार में चौथे विश्व रामायण सम्मेलन का भव्य शुभारंभ हुआ, जिसमें अनेक आध्यात्मिक गुरुओं, धर्माचार्यों और विद्वानों ने हिस्सा लिया। इस आयोजन में चित्रकूट के तुलसी पीठाधीश्वर स्वामी रामभद्राचार्य, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और केन्द्रीय संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। सम्मेलन का उद्देश्य रामायण की वैश्विक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक विरासत पर विमर्श करना था।
रामायण को राष्ट्रग्रंथ घोषित करने की मांग — राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न
अपने संबोधन में स्वामी रामभद्राचार्य ने अत्यंत भावुक अंदाज़ में कहा कि रामायण केवल एक धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और राष्ट्रचेतना का प्रतीक है। उन्होंने ‘राम’ शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि ‘रा’ राष्ट्र का और ‘म’ मंगल का द्योतक है। इसलिए रामायण राष्ट्रहित और मंगलभाव का शास्त्र है। उन्होंने कहा कि यदि रामायण को संसद द्वारा राष्ट्रग्रंथ का दर्जा मिलता है, तभी विश्व रामायण सम्मेलन का उद्देश्य वास्तव में सार्थक होगा।
राम की अवधारणा — अध्यात्म और राष्ट्रधर्म का संगम
स्वामी रामभद्राचार्य ने यह स्पष्ट किया कि राम केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि आदर्श शासन, नैतिकता, करूणा और धर्म के आधारस्तंभ हैं। उन्होंने कहा कि योगियों में रमने वाले नहीं, बल्कि समस्त मानवता को रमाने वाले राम ही सच्चे अर्थों में राष्ट्रपुरुष हैं। रामायण लोकजीवन, नीति, चरित्र और कर्तव्यबोध को दिशा देने वाला शाश्वत ग्रंथ है, जो आज भी हर पीढ़ी को प्रेरित करता है।
आतंकरोध और राष्ट्रसुरक्षा — रामायण से प्रेरित दृष्टिकोण
अपने वक्तव्य में स्वामी रामभद्राचार्य ने पहलगाम आतंकी हमले का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय पूरा देश आक्रोश और पीड़ा से भर गया था। उन्होंने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सख्त कार्रवाई और धर्मग्रंथों से प्रेरित न्यायसिद्धांतों की बात कही थी। उनके अनुसार आतंकवाद के विरुद्ध कठोर रुख केवल राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म का पालन है।
रामायण — भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का आधार
सम्मेलन में यह विचार प्रमुखता से उभरा कि रामायण भारत की सांस्कृतिक स्मृति, नैतिक आदर्शों और आध्यात्मिक जीवन का मूल स्रोत है। यह केवल धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन, समाज का मार्गदर्शन और राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है। इसलिए इसे राष्ट्रग्रंथ घोषित करने का प्रस्ताव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सम्मान की मांग है, जिससे भारतीय पहचान और भी मजबूत होगी।
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