भारत में उच्च शिक्षा को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में नई शिक्षा नीति (NEP 2020) एक महत्वपूर्ण परिवर्तन लेकर आई है। इसी नीति के तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने निर्धारित नियमों के अनुसार विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने स्वतंत्र परिसर स्थापित करने की अनुमति देने की प्रक्रिया शुरू की है। अब तक 15 विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर स्थापित करने के लिए स्वीकृति अथवा Letter of Intent (LOI) जारी किया जा चुका है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारतीय छात्रों के लिए अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता वाली शिक्षा को अधिक सुलभ बनाने के साथ-साथ भारत को वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
किन विदेशी विश्वविद्यालयों को मिली है स्वीकृति
भारत में परिसर स्थापित करने वाले संस्थानों में ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका तथा इटली सहित कई देशों के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय शामिल हैं। ब्रिटेन से University of Southampton, University of Liverpool, University of Bristol तथा University of York को स्वीकृति प्रदान की गई है। ऑस्ट्रेलिया के Deakin University, University of Wollongong और UNSW Sydney भी भारत में अपनी शैक्षणिक गतिविधियां शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसके अतिरिक्त अमेरिका और इटली के कुछ अन्य वैश्विक संस्थान भी भारतीय परिसरों की स्थापना की प्रक्रिया में शामिल हैं। इनमें से कुछ विश्वविद्यालय प्रवेश प्रक्रिया और शैक्षणिक गतिविधियों की तैयारी कर चुके हैं, जबकि कुछ निर्माण और नियामकीय प्रक्रियाओं के विभिन्न चरणों में हैं।
किन शहरों में स्थापित होंगे नए परिसर
विदेशी विश्वविद्यालयों का विस्तार केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहेगा। उच्च शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार गुजरात की GIFT City, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु तथा अन्य प्रमुख शैक्षणिक और आर्थिक केंद्रों को इन परिसरों के लिए चुना जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया के Deakin University और University of Wollongong ने गुजरात की GIFT City में अपने परिसर स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि विभिन्न राज्यों में इन परिसरों की स्थापना से स्थानीय विद्यार्थियों को भी अंतरराष्ट्रीय शिक्षा का लाभ अपने ही क्षेत्र में प्राप्त हो सकेगा तथा क्षेत्रीय आर्थिक और शैक्षणिक विकास को नई गति मिलेगी।
किन पाठ्यक्रमों पर रहेगा विशेष फोकस
विदेशी विश्वविद्यालयों के भारतीय परिसरों में उद्योग और रोजगार की वर्तमान आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अनेक आधुनिक पाठ्यक्रम शुरू किए जाने की संभावना है। इनमें व्यवसाय प्रबंधन, वित्त, डेटा साइंस, AI, Machine Learning, Cyber Security, कंप्यूटर विज्ञान, इंजीनियरिंग, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विधि, डिजाइन, स्वास्थ्य प्रबंधन, मीडिया एवं संचार, पर्यावरण अध्ययन तथा विभिन्न शोध आधारित कार्यक्रम शामिल हो सकते हैं। प्रत्येक विश्वविद्यालय अपने मूल परिसर के शैक्षणिक मानकों के अनुरूप पाठ्यक्रम संचालित करेगा। साथ ही विद्यार्थियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रयोगशालाओं, अनुसंधान सुविधाओं, वैश्विक फैकल्टी और उद्योगों के साथ सहयोग के अवसर भी उपलब्ध कराए जाने की संभावना है।
विद्यार्थियों को क्या होंगे प्रमुख लाभ
विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत आने से उन विद्यार्थियों को विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है, जो आर्थिक, पारिवारिक या अन्य कारणों से विदेश जाकर पढ़ाई नहीं कर पाते। विदेशों में शिक्षा प्राप्त करने की तुलना में भारत स्थित परिसरों में पढ़ाई अपेक्षाकृत कम खर्चीली हो सकती है, क्योंकि रहने, यात्रा और अन्य खर्चों में उल्लेखनीय कमी आएगी। इसके साथ ही विद्यार्थियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की डिग्री, वैश्विक शैक्षणिक वातावरण और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों का लाभ अपने देश में ही प्राप्त होगा। शिक्षा विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इससे भारतीय विश्वविद्यालयों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और समग्र उच्च शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता में सुधार को प्रोत्साहन मिलेगा।
भारत को वैश्विक शिक्षा केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
विशेषज्ञों के अनुसार विदेशी विश्वविद्यालयों की उपस्थिति केवल छात्रों के लिए अवसर नहीं बढ़ाएगी, बल्कि भारत को अंतरराष्ट्रीय शिक्षा और अनुसंधान के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने में भी सहायक होगी। इससे विदेशी विद्यार्थियों को आकर्षित करने, संयुक्त शोध परियोजनाओं को बढ़ावा देने, वैश्विक शैक्षणिक सहयोग मजबूत करने तथा ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने में मदद मिल सकती है। हालांकि इस पहल की सफलता गुणवत्ता नियंत्रण, नियामकीय पारदर्शिता और भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों के साथ संतुलित प्रतिस्पर्धा पर भी निर्भर करेगी। यदि इन सभी पहलुओं का प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक उच्च शिक्षा के मानचित्र पर और अधिक सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकता है।