हाल के वर्षों में जो भी बड़ी फिल्में आई हैं, उनमें यह स्पष्ट दिखने लगा है कि नए संगीत के बजाय पुराने गानों के रीक्रिएशन या सीधे इस्तेमाल का चलन तेज हो चुका है। आदित्य धर की सुपरहिट फिल्म ‘धुरंधर’ इसका ताजा उदाहरण है, जहाँ ’90 का संगीत कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरा। सच तो यह है कि ’90 के बाद से भारतीय फिल्म संगीत की मौलिकता निरंतर गिरावट में रही है, जिससे पुरानी धुनों का दबदबा स्वाभाविक रूप से बढ़ा है।
मूल सृजन का संकट और नकल-आधारित प्रयोग
नए दौर के अनेक संगीतकार नई रचनात्मकता दिखाने में विफल रहे हैं। उनके कंपोज़िशन अक्सर नकल, रीमिक्स या किसी पहले से लोकप्रिय धुन के आधार पर टिका होता है। ‘मोहरा’ का तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त, ‘तेज़ाब’ का एक दो तीन या ‘जुड़वां’ का चलती है क्या नौ से बारह—ऐसे कई क्लासिक गीत बिना किसी नई संवेदना के रीमिक्स कर दिए जाते हैं और इसे “नया गीत” बताया जाता है।
रीमिक्स के बिना भी, पुराना संगीत फिर से छा गया
न सिर्फ रीमिक्स बल्कि धीरे-धीरे ’60, ’70 और ’80 के दशक के गानों को भी फिल्मों में सिचुएशन-बेस्ड तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। निर्माता मानते हैं कि कहानी के प्रवाह में कुछ दृश्य ऐसे आते हैं जहाँ पुराना गाना नए से ज्यादा प्रभावी बैठता है, और कॉपीराइट क्लियरेंस के बाद इसका उपयोग बढ़ गया है। यह दर्शाता है कि मूल रचनाओं की कमी ने पुराने संगीत को नए सिनेमा में नया जीवन दे दिया है।
रीमिक्स संस्कृति का नुकसान और दिग्गजों की वापसी
रीमिक्स के बढ़ते दौर ने न केवल फिल्म संगीत की पहचान कमजोर की बल्कि कई दिग्गज संगीतकारों की महत्ता भी पीछे धकेली। दिलचस्प यह है कि कई बड़े रीमिक्स निर्माताओं का तर्क यह होता है कि पुराने हिट गानों की मुखड़ा-लाइन लोग ज्यादा याद रखते हैं, इसलिए वे उसी को दोहराते हैं। यही वजह है कि आज टीवी रियलिटी शो में भी ’90 के कलाकार—उदित नारायण, अलका याज्ञिक, कुमार शानू, साधना सरगम, रूप कुमार राठौड़ आदि—अपनी भारी लोकप्रियता के कारण सबसे ज्यादा बुलाए जाते हैं, और प्रायोजक उन्हें मनचाही फीस देने को तैयार रहते हैं।
नए संगीतकारों में वह ऊंचाई नहीं
वर्तमान पीढ़ी के संगीतकारों में से कुछ नाम जरूर उभरते हैं, लेकिन ’90 के संगीतकारों जितनी गहराई और स्थायित्व दिखना मुश्किल है। प्रीतम जैसे कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो अमित त्रिवेदी, साजिद–वाजिद, विशाल–शेखर, अंकित तिवारी आदि कभी-कभी सुरीले गीत दे पाते हैं, पर निरंतरता नहीं रख पाते। परिणामस्वरूप, ’90 के गानों को आज भी वैसी ही जगह मिलती है जैसी कभी मूल दौर में थी।
निर्देशकों की जिम्मेदारी और संगीत दृष्टि की कमी
दूसरी ओर, कई नए निर्देशक भी संगीत की समझ में उतने परिपक्व नहीं हैं। संगीत चयन में वह रचनात्मक साहस कम दिखाई देता है जो एक पूरी पीढ़ी की पहचान बना सकता था। संजय लीला भंसाली इस मामले में अपवाद हैं, जिनकी फिल्मों में आज भी मौलिक, सुरीली और स्थायी धुनें सुनने को मिलती हैं। ‘धुरंधर’ में पुराने हिट गीतों का योजनाबद्ध उपयोग हुआ है और निर्देशक आदित्य धर खुद कहते हैं कि सिचुएशन के अनुरूप पुराने गीत ही सर्वोत्तम लगे।
क्यों खास है ’90 का दशक?
यह सवाल महत्वपूर्ण है कि पुरानों में सबसे ज्यादा ’90 के गानों का उपयोग क्यों होता है। वजह साफ है—नए संगीतकारों को ’60–’80 के दशकों का गंभीर, गहन और शास्त्रीय प्रभाव वाला संगीत समझना कठिन लगता है। इसके मुकाबले ’90 के गाने अधिक सरल, मधुर, आधुनिक और फिल्म की स्थिति में फिट बैठने वाले होते हैं। इसलिए ’90 एक ऐसा पुल बन गया है जिस पर नए संगीतकार सहज महसूस करते हैं और दर्शक भी इसे खुले मन से स्वीकारते हैं।
पुराने संगीत की वापसी, नए दौर की चुनौती
बॉलीवुड के संगीत परिदृश्य में यह बदलाव सिर्फ nostalgia नहीं है, बल्कि नए संगीत की कमजोरी का संकेत भी है। जब तक नए संगीतकार जोखिम लेकर मौलिक धुनें नहीं रचते, तब तक पुराना संगीत फिल्मों पर यूं ही हावी रहेगा। ’90 का संगीत आज भी दर्शकों के दिलों में ताज़ा है, और यही कारण है कि नई फिल्मों में भी उसे वही सम्मानजनक जगह मिल रही है जो कभी उसके सुनहरे दौर में थी।
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