वहीदा रहमान का जन्म तमिलनाडु में हुआ था, और बचपन से ही वे नृत्य के प्रति अत्यधिक जुनूनी थीं। घर में शीशे के सामने डांस करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था, जिसे देखकर उनके पिता उन्हें मज़ाक में ‘पागल’ कहा करते थे। भरतनाट्यम में प्रशिक्षित वहीदा मंच पर नृत्य करती हुई बड़ी हुईं, और यहीं से उन्हें फिल्मों की दुनिया का आकर्षण महसूस हुआ। केवल 13–14 वर्ष की आयु में पिता के निधन के बाद घर की परिस्थितियों ने उन्हें अभिनय के क्षेत्र में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। पिता के मित्र तथा तेलुगु फ़िल्म निर्माता ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और मनाया कि वहीदा फिल्मों में काम करें। मजबूरी और परिस्थिति दोनों मिलकर उन्हें कैमरे के सामने ले आईं, जहाँ उन्होंने अपने दमदार अभिनय से जल्दी ही पहचान बना ली।
दक्षिण भारतीय सिनेमा से बॉलीवुड तक की शानदार यात्रा
वहीदा ने 1955 में तेलुगु फ़िल्म ‘रोजुलु मरायी’ से अपनी शुरुआत की, जिसने उन्हें क्षेत्रीय सिनेमा का लोकप्रिय चेहरा बना दिया। उसी वर्ष वे एनटी रामा राव की फिल्म ‘जयसिम्हा’ का हिस्सा बनीं, जहाँ उनकी एक मुलाकात उनकी जिंदगी बदलने वाली साबित हुई। यहीं उनकी भेंट हिंदी सिनेमा के महान निर्देशक गुरु दत्त से हुई। गुरु दत्त उन्हें मुंबई लेकर आए और फिल्म ‘सीआईडी’ में अवसर दिया। देव आनंद के साथ आई इस फिल्म ने वहीदा को हिंदी फिल्म उद्योग में भी स्थापित कर दिया। इसके बाद ‘प्यासा’, ‘कागज़ के फूल’ और ‘गाइड’ जैसी क्लासिक फिल्में उनके करियर को स्वर्णिम ऊँचाइयों तक ले गईं।
अभिनय की शर्तों पर कायम रहने वाली अदाकारा
वहीदा रहमान न केवल उत्तम अभिनेत्री थीं, बल्कि अपने सिद्धांतों पर भी पूरी दृढ़ता से अडिग रहती थीं। फिल्में साइन करते समय वे साफ़ कह देती थीं कि वे स्लीवलेस कपड़े नहीं पहनेंगी। उनका सौम्य व्यक्तित्व और शालीनता ही उनकी पहचान बन गई। पाँच दशकों के करियर में उन्होंने 90 से अधिक फ़िल्में कीं, और एक नेशनल अवॉर्ड तथा तीन फिल्मफेयर अवॉर्ड अपने नाम किए। उनके योगदान को सम्मानित करते हुए वर्ष 2021 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान है।
अमिताभ बच्चन का दिलकश क्रश और अनोखा किस्सा
वहीदा रहमान की सुंदरता और प्रतिभा केवल दर्शकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि अमिताभ बच्चन भी उनके बड़े प्रशंसक थे। एक बार ‘रेशमा और शेरा’ की शूटिंग के दौरान यह प्रशंसा दिलचस्प किस्से में बदल गई। तेज धूप और तपती रेत के बीच एक दृश्य में वहीदा रहमान और सुनील दत्त को नंगे पैर बैठना था। ब्रेक लगते ही अमिताभ ने बिना एक पल गंवाए वहीदा जी की चप्पलें उठाईं और उनकी ओर भागते हुए उन्हें पहनने में मदद की। इस घटना ने न केवल बिग बी के आदर और लगाव को उजागर किया, बल्कि यह भी बताया कि वहीदा रहमान का व्यक्तित्व लोगों पर कितना गहरा प्रभाव छोड़ता था। बाद में अमिताभ और वहीदा ने ‘त्रिशूल’, ‘अदालत’ और ‘नमक हलाल’ जैसी कई फिल्मों में साथ काम किया, जहाँ उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री ने दर्शकों का दिल जीत लिया।
एक विरासत, जो आज भी उतनी ही प्रेरणादायक
वहीदा रहमान केवल एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि सादगी और प्रतिभा की मिसाल थीं। उनकी यात्रा मजबूरी से शुरू होकर महानता तक पहुँची, और आज भी उनके अभिनय की चमक भारतीय सिनेमा की विरासत को गौरवान्वित करती है। उनका व्यक्तित्व, कला और जीवन के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। अमिताभ बच्चन जैसे महान कलाकारों द्वारा किया गया सम्मान और प्रेम यह सिद्ध करता है कि वहीदा रहमान भारतीय सिनेमा की उन दुर्लभ हस्तियों में से हैं, जिन्होंने हर दिल को छुआ है।
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