ब्रेन ट्यूमर दिमाग में असामान्य कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि से बनने वाली गांठ होती है। यह दिमाग के किसी भी हिस्से में विकसित हो सकता है और वहां के सामान्य कार्यों को प्रभावित करता है। चूंकि दिमाग शरीर का सबसे संवेदनशील अंग है, इसलिए इसमें होने वाली हल्की-सी गड़बड़ी भी पूरे शरीर पर असर डाल सकती है।
ब्रेन ट्यूमर के प्रकार और उनकी प्रकृति
चिकित्सकीय रूप से ब्रेन ट्यूमर दो प्रमुख प्रकारों में बांटे जाते हैं। बेनाइन ट्यूमर कैंसरयुक्त नहीं होते, लेकिन आकार बढ़ने पर ये भी खतरनाक हो सकते हैं। वहीं मेलिग्नेंट ट्यूमर कैंसरयुक्त होते हैं और तेजी से फैलकर जानलेवा स्थिति पैदा कर सकते हैं। दोनों ही स्थितियों में समय पर पहचान और इलाज अत्यंत आवश्यक है।
ये शुरुआती लक्षण दिखें तो रहें सतर्क
लगातार या असामान्य सिरदर्द, बिना कारण उल्टी या मतली, बार-बार चक्कर आना, आंखों से धुंधला दिखना, याददाश्त कमजोर होना, बोलने या समझने में परेशानी, शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी या सुन्नपन—ये सभी संकेत ब्रेन ट्यूमर की ओर इशारा कर सकते हैं। अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो इन्हें नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।
लक्षणों को हल्के में लेना क्यों पड़ सकता है भारी
जैसे-जैसे ट्यूमर बढ़ता है, वह दिमाग के ऊतकों पर दबाव डालता है। इससे सोचने, देखने, सुनने, बोलने और संतुलन बनाए रखने की क्षमता प्रभावित होती है। कई मामलों में देर से पहचान होने पर इलाज जटिल हो जाता है और जीवन को गंभीर खतरा हो सकता है।
किन लोगों में रहता है ज्यादा जोखिम
कुछ लोगों में ब्रेन ट्यूमर का खतरा सामान्य से अधिक होता है। जिनके परिवार में पहले किसी को यह बीमारी रही हो, जो लंबे समय तक रेडिएशन के संपर्क में रहे हों, 40–50 वर्ष की आयु पार कर चुके लोग, तथा केमिकल फैक्ट्री या प्रदूषित वातावरण में काम करने वाले व्यक्तियों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
ब्रेन ट्यूमर के खतरे को कम करने के उपाय
हालांकि ब्रेन ट्यूमर से पूरी तरह बचाव संभव नहीं है, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली से जोखिम को कम किया जा सकता है। बिना जरूरत बार-बार एक्स-रे या सीटी स्कैन न कराएं, जहरीले केमिकल और तेज गंध वाले पदार्थों से दूरी बनाएं, नियमित योग और व्यायाम करें, संतुलित आहार लें और किसी भी असामान्य लक्षण के बने रहने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।
समय पर जांच ही सबसे बड़ा बचाव
ब्रेन ट्यूमर के मामलों में समय पर पहचान सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शुरुआती चरण में बीमारी का पता चल जाए तो इलाज की सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसलिए शरीर के संकेतों को समझें और सतर्क रहें।
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