यदि छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ जाता है, मन जल्दी अशांत हो जाता है या एकाग्रता भटकने लगती है, तो यह केवल स्वभाव का हिस्सा नहीं है बल्कि मन की समस्या का शुरुआती संकेत हो सकता है। अक्सर लोग इसे व्यवहारिक आदत मानकर अनदेखा कर देते हैं, जबकि मानसिक सेहत के लिए यह एक रेड अलर्ट है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, भावनात्मक सहारे की कमी और हर समय बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव मन को थका देता है, जिससे भावनाएं असंतुलित हो जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह वह समय होता है जब व्यक्ति को खुद से यह पूछना चाहिए कि वह मन की परेशानी को स्वीकार कर रहा है या केवल छिपा रहा है।
वैश्विक स्तर पर गंभीर होती मानसिक स्वास्थ्य की चुनौती
विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही मानसिक सेहत को वैश्विक आपदा घोषित कर चुका है। बच्चों से लेकर वयस्कों तक, हर आयु वर्ग में मानसिक चुनौतियों का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। घरेलू तनाव, कार्यस्थल का दबाव, सामाजिक अलगाव, अकेलापन और समाज में दिखती संवेदनहीनता—ये सभी संकेत बताते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य लगातार खतरे में है। कई बार पूरी तरह सामान्य दिखने वाले लोग भी इस समस्या से जूझ रहे होते हैं। यदि इन्हें समय रहते नहीं पहचाना गया, तो ये छोटी समस्याएँ गंभीर विकारों का रूप ले सकती हैं, इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सक्रिय कदम उठाना बेहद जरूरी है।
तनाव और कार्टिसोल: शरीर पर पड़ने वाला प्रभाव
एम्स दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. नंद कुमार बताते हैं कि लोग अक्सर अधिक गुस्सा होने पर खुद को दोषी ठहराने लगते हैं, जिससे समस्या और गहरी हो जाती है। अत्यधिक तनाव की स्थिति में शरीर में कार्टिसोल नामक हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। यह हार्मोन तनाव से निपटने की स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन लगातार तनाव रहने पर इसका बढ़ा हुआ स्तर हानिकारक साबित होता है। यह इंसुलिन प्रतिरोध, मांसपेशियों में कमी, पेट के मोटापे और कई शारीरिक विकारों का कारण बन सकता है। इसलिए तनाव की पहचान और समय पर रोकथाम शरीर और मन दोनों के लिए अनिवार्य है।
मन के ‘एंटीबॉडीज’: सकारात्मक सोच के संरक्षक
जिस तरह शरीर में एंटीबॉडीज़ बाहरी संक्रमणों से लड़ती हैं, उसी तरह मन के अंदर भी भावनात्मक एंटीबॉडीज मौजूद होती हैं। हंगरी के पॉज़िटिव साइकोलॉजी विशेषज्ञ एटिलिया ओलाह के अनुसार, मन के ये 16 संसाधन नकारात्मक विचारों और मानसिक आक्रमणों से रक्षा करते हैं। इनमें सकारात्मक सोच, आत्म-विकास की समझ, भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता, लक्ष्य की ओर देखने की दृष्टि और परिस्थितियों का समाधान खोजने की योग्यता शामिल है। इन मानसिक संसाधनों को मजबूत बनाकर व्यक्ति तनाव और असुरक्षा की भावना से बेहतर तरीके से लड़ सकता है।
छोटे प्रयास जो ला सकते हैं बड़ा परिवर्तन
मानसिक स्वास्थ्य सुधार की दिशा में पहला कदम यह स्वीकार करना है कि समस्या है और इसे छिपाने के बजाय समझकर हल किया जा सकता है। स्वयं को 'मैं ऐसा ही हूं' कहकर सीमित कर लेना सुधार की प्रक्रिया को रोक देता है। छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर सक्रिय रहना, माइंडफुलनेस का अभ्यास करना और नकारात्मक विचारों से दूरी बनाना मन को स्थिर करता है। यदि थकान महसूस हो तो लंबी सांसों का अभ्यास काफी राहत दे सकता है। दिनचर्या में एरोबिक व्यायाम, जैसे जॉगिंग या तैराकी, शामिल करने से एंडोर्फिन नामक खुशी हार्मोन का स्राव बढ़ता है, जो मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। पर्याप्त नींद और स्वस्थ खानपान तनाव को नियंत्रित रखने के बेहद महत्वपूर्ण साधन हैं।
इन संकेतों को पहचानना है आवश्यक
नींद का बार-बार खुलना या कम सोना, सांस लेने में तकलीफ, गर्दन या पीठ में अकड़न, मनोदशा का अस्थिर रहना, स्वयं को बेकार समझना और भविष्य को नकारात्मक दृष्टि से देखना ये सभी संकेत बताते हैं कि मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है। यदि समुचित भावनात्मक प्रतिक्रिया देने में कठिनाई महसूस होने लगे, तो यह मन की थकान का स्पष्ट प्रमाण है और ऐसे संकेतों को अनदेखा नहीं करना चाहिए।
समय पर संवाद और उपचार आवश्यक
मानसिक समस्या को छिपाना उसे और जटिल बना देता है। इसलिए मन की बात अपने करीबियों से साझा करें। कई बार सिर्फ किसी का ध्यान से सुन लेना भी उपचार का पहला और सबसे जरूरी कदम बन सकता है। मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों में वृद्धि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बीते चार वर्षों में भारत में एंटीडिप्रेसेंट दवाओं का बाजार 64 प्रतिशत तक बढ़ गया है। 2020 में इन दवाओं का बाजार 1,540 करोड़ रुपये का था, जो 2024 तक बढ़कर 2,536 करोड़ रुपये हो गया। यह आंकड़ा बताता है कि मानसिक सेहत पर ध्यान देना क्यों आज पहले से कहीं ज्यादा आवश्यक हो गया है।
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