26 जनवरी 1950 को भारत ने जिस संविधान के साथ एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में कदम रखा, वह केवल शासन व्यवस्था नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का दस्तावेज था। 77 वर्षों में संविधान ने देश को स्थिरता, निरंतरता और संस्थागत मजबूती दी। लोकतांत्रिक ढांचे ने विविधताओं से भरे समाज को एक सूत्र में बाँधने का कार्य किया, जो भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जा सकता है।
सामाजिक प्रगति और सामाजिक विघटन का द्वंद्व
साक्षरता, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और वंचित वर्गों के अधिकारों के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़ी है और सामाजिक गतिशीलता के नए अवसर खुले हैं। किंतु समानांतर रूप से असहिष्णुता, वैचारिक ध्रुवीकरण और संवाद के स्थान पर आक्रोश ने सामाजिक सौहार्द को कमजोर किया है। बहुलतावाद और सहिष्णुता, जो भारतीय समाज की पहचान रहे हैं, आज नई चुनौतियों से घिरे हैं।
आर्थिक विकास बनाम असमानता की बढ़ती खाई
भारत आज विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल भुगतान, स्टार्टअप संस्कृति और बुनियादी ढाँचे का विस्तार देश की आर्थिक क्षमता को दर्शाता है। इसके बावजूद अमीर-गरीब की खाई, शहरी-ग्रामीण विषमता और असंगठित क्षेत्र की असुरक्षा यह प्रश्न उठाती है कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से क्यों नहीं पहुँच पाया।
तकनीकी छलांग और नई सामाजिक चुनौतियाँ
डिजिटल इंडिया, यूपीआई, आधार, अंतरिक्ष विज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भारत की प्रगति वैश्विक स्तर पर सराही गई है। तकनीक ने शासन को अधिक पारदर्शी और सेवाओं को सुलभ बनाया है। लेकिन डिजिटल विभाजन, डेटा गोपनीयता, साइबर अपराध और तकनीक-आधारित बेरोज़गारी जैसी समस्याएँ यह दर्शाती हैं कि तकनीकी प्रगति के साथ संतुलित और संवेदनशील नीतियाँ अनिवार्य हैं।
कृषि संकट और ग्रामीण भारत की वास्तविकता
कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ा है और तकनीक का प्रवेश हुआ है, फिर भी किसान की आय, कर्ज़ का दबाव, जलवायु परिवर्तन और बाज़ार की अनिश्चितता गंभीर बनी हुई हैं। ग्रामीण भारत का संघर्ष यह संकेत देता है कि आर्थिक विकास का मॉडल अभी भी असंतुलित है और कृषि सुधारों को अधिक व्यावहारिक दृष्टि की आवश्यकता है।
रोज़गार, युवा और भविष्य की चिंता
शिक्षा का विस्तार और डिग्रियों की संख्या बढ़ने के बावजूद गुणवत्तापूर्ण रोज़गार का अभाव 77वें गणतंत्र दिवस पर सबसे बड़ा प्रश्न बनकर उभरता है। अस्थायी और असुरक्षित नौकरियाँ युवाओं में निराशा पैदा कर रही हैं, जो लोकतंत्र और सामाजिक स्थिरता के लिए दीर्घकालिक चुनौती हो सकती हैं।
गरीबी, जातिवाद और अधूरा सामाजिक न्याय
गरीबी उन्मूलन में भारत ने बड़ी सफलता हासिल की है और करोड़ों लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर आए हैं। फिर भी कुपोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा की असमान गुणवत्ता यह बताती है कि गरीबी केवल आय का नहीं, अवसरों का भी संकट है। जातिवाद और पहचान की राजनीति आज भी सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती देती है, भले ही संवैधानिक और कानूनी प्रयास जारी हों।
उभरती चुनौतियाँ और लोकतंत्र की परीक्षा
जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय संकट, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस, संस्थाओं की स्वायत्तता और वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता भारत के सामने नई चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रही हैं। ये प्रश्न केवल सरकार के नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक विवेक और नागरिक जिम्मेदारी से जुड़े हैं।
उपलब्धियों का उत्सव, खामियों का मंथन
77वाँ गणतंत्र दिवस यह याद दिलाता है कि भारत ने संवैधानिक स्थिरता, वैश्विक पहचान और विकास की गति पाई है, लेकिन संवाद, संवेदनशीलता और सामाजिक समरसता जैसे कुछ मूल्य कमजोर भी पड़े हैं। गणतंत्र का वास्तविक उत्सव तभी संभव है जब हम उपलब्धियों के साथ-साथ कमियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का साहस दिखाएँ। यही संविधान और लोकतंत्र के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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