भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां असहमति की आवाज को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की गौरवशाली परंपरा भी। महात्मा गांधी के सत्याग्रह से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के असंख्य आंदोलनों तक, भारत ने दुनिया को दिखाया है कि नैतिक साहस किस प्रकार शक्तिशाली व्यवस्था को भी आत्ममंथन के लिए विवश कर सकता है। लेकिन आज एक असहज प्रश्न सामने है—क्या हमारे यहां विरोध की संस्कृति अपने मूल उद्देश्य से भटक रही है? क्या प्रत्येक असहमति को धरने में, प्रत्येक विवाद को शक्ति प्रदर्शन में और प्रत्येक राजनीतिक असुविधा को राष्ट्रव्यापी संकट में बदल देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है? निश्चित रूप से हर आंदोलन गलत नहीं होता, हर प्रदर्शन के पीछे राजनीतिक स्वार्थ नहीं होता और हर असहमति को संदेह की दृष्टि से देखना भी लोकतांत्रिक नहीं है। किंतु यह भी उतना ही सच है कि विरोध का अधिकार किसी को अपने उद्देश्य, साधन और आचरण की समीक्षा से मुक्त नहीं करता। जब आंदोलन की सफलता उसके तर्कों से नहीं, बल्कि उससे उत्पन्न दबाव से मापी जाने लगे; जब प्रमाणों की तुलना में आरोप अधिक प्रभावशाली हो जाएं; जब संवाद की जगह टकराव और समाधान की जगह अनिश्चितकालीन संघर्ष को महत्व मिलने लगे, तब लोकतंत्र के सामने आत्ममंथन का प्रश्न खड़ा होता है। आखिर किसी भी आंदोलन का अंतिम लक्ष्य क्या होना चाहिए—समस्या का समाधान या समस्या को राजनीतिक पूंजी में बदल देना? यह प्रश्न आज केवल आंदोलनकारियों से नहीं, बल्कि उन्हें संरक्षण देने वाले राजनीतिक दलों, उनका प्रचार करने वाले मंचों और उनके पीछे खड़े संगठनों से भी पूछा जाना चाहिए।
संवैधानिक पदों पर प्रहार: असहमति का अधिकार या प्रतिष्ठा धूमिल करने की रणनीति?
लोकतंत्र में संवैधानिक पदाधिकारी आलोचना से परे नहीं होते। उनके निर्णयों की समीक्षा होनी चाहिए, उनकी जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए और यदि किसी गंभीर अनियमितता के प्रमाण हों, तो निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए। लेकिन निर्णय की आलोचना और व्यक्ति पर निराधार आरोप लगाने के बीच एक ऐसी महीन रेखा है, जिसे मिटाने की कोशिश अंततः पूरी संवैधानिक व्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकती है। किसी संस्था के निर्णय से असहमति होना एक बात है; उसके पदाधिकारी की नीयत पर बिना विश्वसनीय प्रमाण सवाल उठाकर सार्वजनिक अभियान चलाना दूसरी बात। न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा केवल उनके पदाधिकारियों की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा नहीं होती, बल्कि वह उस व्यवस्था के प्रति नागरिकों के विश्वास से जुड़ी होती है, जिसके आधार पर देश संचालित होता है। यदि किसी निर्णय से शिकायत है, तो उसके लिए उपलब्ध कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाना चाहिए। यदि किसी पदाधिकारी के आचरण पर गंभीर सवाल हैं, तो प्रमाण सामने रखे जाने चाहिए। सड़क पर उतरना भी नागरिक अधिकार है, लेकिन सड़क पर जुटी भीड़ किसी आरोप को अपने आप सत्यापित नहीं कर देती। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की लोकप्रियता, राजनीतिक प्रभाव या समर्थकों की संख्या कानून और प्रमाण से ऊपर नहीं हो सकती। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब पैदा होती है, जब किसी संवैधानिक पद को निशाना बनाना ही आंदोलन की पहचान बन जाए और उसके आयोजकों को यह विश्वास होने लगे कि पर्याप्त शोर पैदा करके वे संस्थागत निर्णयों पर अनुचित दबाव बना सकते हैं। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में इस प्रवृत्ति पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। संस्थाओं की आलोचना आवश्यक है, लेकिन उनकी गरिमा को राजनीतिक प्रतिशोध का औजार बनने देना उतना ही खतरनाक है।
राजनीतिक महत्वाकांक्षा का नया व्याकरण: जनसेवा या सत्ता के गलियारों में प्रवेश?
राजनीति में महत्वाकांक्षा स्वाभाविक है, लेकिन महत्वाकांक्षा और अवसरवाद के बीच अंतर होता है। जनहित में संघर्ष करने वाला व्यक्ति किसी वास्तविक समस्या को सामने लाता है, उसके समर्थन में तथ्य प्रस्तुत करता है, समाधान के लिए संवाद करता है और अपने आचरण को भी जवाबदेही के दायरे में रखता है। इसके विपरीत, राजनीतिक अवसरवाद का एक रूप ऐसा भी हो सकता है, जिसमें सार्वजनिक समस्या केवल निजी पहचान बनाने का माध्यम बन जाती है। आंदोलन का मंच लोकप्रियता अर्जित करने, राजनीतिक दलों का ध्यान खींचने, सत्ता के निकट पहुंचने अथवा किसी पक्ष पर दबाव बनाकर लाभ प्राप्त करने का साधन बन सकता है। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आंदोलनकारी की सार्वजनिक मांग और उसके वास्तविक आचरण में कितनी संगति है। क्या वह अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करता है? क्या वह समान परिस्थितियों में अपने राजनीतिक सहयोगियों से भी वही सवाल पूछता है? क्या वह समाधान मिलने पर आंदोलन समाप्त करने के लिए तैयार है? क्या उसकी प्रतिबद्धता जनहित के प्रति है या केवल उन मुद्दों तक सीमित है, जिनसे उसे राजनीतिक लाभ मिलता है? हालांकि, इन प्रश्नों के आधार पर किसी व्यक्ति को बिना प्रमाण सत्ता का दलाल अथवा किसी गुप्त योजना का हिस्सा घोषित करना भी उचित नहीं होगा। आरोप लगाने वाले को भी अपने आरोपों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन राजनीतिक दलों के लिए यह चेतावनी स्पष्ट है कि वे अपने विरोधियों को असहज करने की सुविधा के कारण ऐसे तत्वों को संरक्षण न दें, जिनके आचरण से लोकतांत्रिक मर्यादाएं कमजोर होती हों। आज यदि कोई दल किसी अनुचित प्रवृत्ति को इसलिए बढ़ावा देता है कि फिलहाल उससे उसके प्रतिद्वंद्वी को नुकसान पहुंच रहा है, तो कल वही प्रवृत्ति उसके अपने लिए संकट बन सकती है। राजनीति में अवसरवाद का लाभ तत्काल दिखाई दे सकता है, लेकिन संस्थागत अविश्वास की कीमत पूरा राष्ट्र चुकाता है।
आंदोलन की फंडिंग और विदेशी प्रभाव: सवालों से परहेज क्यों, प्रमाणों के बिना आरोप क्यों?
बड़े आंदोलनों के पीछे संगठन, संसाधन, प्रचार तंत्र और वित्तीय व्यवस्थाएं होती हैं। मंच तैयार करने से लेकर परिवहन, प्रचार सामग्री, डिजिटल अभियान और अन्य व्यवस्थाओं तक, अनेक गतिविधियों के लिए धन और संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में यह पूछना पूरी तरह उचित है कि इन संसाधनों की व्यवस्था कैसे होती है, कौन-से संगठन अभियान में सहयोग करते हैं और क्या संबंधित संस्थाएं लागू वित्तीय तथा कानूनी नियमों का पालन करती हैं। पारदर्शिता की मांग को षड्यंत्र कहना उचित नहीं, लेकिन संसाधनों की मौजूदगी को ही षड्यंत्र का प्रमाण मान लेना भी विवेकसम्मत नहीं है। यही कसौटी विदेशी प्रभाव के प्रश्न पर भी लागू होती है। भारत के रणनीतिक महत्व को देखते हुए यह कल्पना करना कठिन नहीं कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शक्तियां अपने हितों के अनुसार भारत की नीतियों और आंतरिक परिस्थितियों को प्रभावित करने में रुचि रख सकती हैं। विश्व राजनीति में ऐसा प्रभाव स्थापित करने के अनेक प्रयास इतिहास में देखे गए हैं। इसलिए अवैध विदेशी वित्तपोषण, संगठित दुष्प्रचार या किसी प्रमाणित बाहरी हस्तक्षेप की आशंका की जांच होना आवश्यक है। लेकिन क्या हर धरना किसी विदेशी योजना का हिस्सा है? क्या प्रत्येक सरकार-विरोधी आवाज के पीछे बाहरी हाथ है? इन सवालों का उत्तर केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए विश्वसनीय दस्तावेज, वित्तीय साक्ष्य, स्वतंत्र जांच और कानूनसम्मत निष्कर्ष चाहिए। राष्ट्रहित का अर्थ यह नहीं कि हर असहमति को संदेह के घेरे में डाल दिया जाए; राष्ट्रहित का अर्थ यह है कि वास्तविक खतरे की पहचान हो और निर्दोष नागरिकों के अधिकार भी सुरक्षित रहें। भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें किसी आंदोलन के आयोजक से उसके संसाधनों के बारे में उचित प्रश्न पूछे जा सकें और किसी विदेशी हस्तक्षेप के आरोप की निष्पक्ष जांच हो सके। न पारदर्शिता से भागने की छूट होनी चाहिए, न राष्ट्रवाद के नाम पर बिना प्रमाण किसी को कठघरे में खड़ा करने की।
युवा शक्ति को मोहरा बनाने का खतरा: नारों से राष्ट्र निर्माण नहीं होता
भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। नई पीढ़ी में ऊर्जा है, महत्वाकांक्षा है और सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा है। यही शक्ति देश को विज्ञान, तकनीक, उद्यमिता, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में आगे ले जा सकती है। लेकिन युवा ऊर्जा को यदि अधूरी जानकारी, उत्तेजक प्रचार और राजनीतिक ध्रुवीकरण की दिशा में मोड़ दिया जाए, तो वही शक्ति अनावश्यक टकराव का कारण भी बन सकती है। डिजिटल माध्यमों के इस दौर में किसी आरोप का वीडियो कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। कई बार जांच और तथ्य सामने आने से पहले ही किसी व्यक्ति या संस्था के बारे में धारणा बना दी जाती है। भावनात्मक नारे विवेकपूर्ण प्रश्नों पर भारी पड़ने लगते हैं और भीड़ का समर्थन सत्य का प्रमाण समझ लिया जाता है। ऐसे वातावरण में युवाओं को यह समझना होगा कि किसी आंदोलन में भाग लेना उनका अधिकार है, लेकिन उसके उद्देश्य, नेतृत्व, प्रमाण और परिणाम को समझना उनकी नागरिक जिम्मेदारी भी है। किसी आंदोलन में शामिल प्रत्येक युवा को दिशाहीन या किसी का मोहरा कहना अनुचित होगा। इतिहास में युवाओं ने अनेक बार न्याय, स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन किसी भी पीढ़ी को राजनीतिक प्रचार का उपकरण बनने से बचने के लिए स्वतंत्र विचार, तथ्यपरक अध्ययन और आलोचनात्मक विवेक की आवश्यकता होती है। युवाओं को यह प्रश्न पूछना चाहिए कि जिस आंदोलन के लिए उनसे समय, श्रम और भावनात्मक समर्थन मांगा जा रहा है, उसका ठोस उद्देश्य क्या है? उसकी मांगें पूरी होने पर क्या बदलेगा? क्या आंदोलन के नेतृत्व ने अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त प्रमाण दिए हैं? क्या वह कानून और संवाद का सम्मान करता है? यदि इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, तो केवल भीड़ के उत्साह में बह जाना समझदारी नहीं होगी। राष्ट्र निर्माण के लिए आक्रोश की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन आक्रोश को दिशा देने के लिए विवेक अनिवार्य है।
सत्ता और विपक्ष को चेतावनी: लोकतंत्र किसी की निजी राजनीतिक जागीर नहीं
देश की वर्तमान परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार करते समय सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की भूमिका का निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक है। सत्तारूढ़ दल की जिम्मेदारी है कि वह जनता की शिकायतों का समय पर समाधान करे, प्रशासन को जवाबदेह बनाए और संस्थाओं की स्वतंत्रता तथा प्रतिष्ठा की रक्षा करे। यदि सरकार संवाद के रास्ते बंद करती है, वैध शिकायतों की उपेक्षा करती है या आलोचना को केवल राजनीतिक विरोध समझकर खारिज कर देती है, तो वह अनावश्यक असंतोष को जन्म दे सकती है। दूसरी ओर, विपक्ष का दायित्व केवल सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि शासन की कमियों को प्रमाणों के साथ उजागर करना, वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करना और जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाना भी है। यदि विपक्ष हर विवाद को राजनीतिक संकट में बदलने लगे और प्रत्येक आंदोलन को केवल सत्ता पर दबाव बनाने के साधन के रूप में देखने लगे, तो उसकी लोकतांत्रिक विश्वसनीयता भी प्रभावित होगी। यही बात सत्तारूढ़ दलों पर भी लागू होती है, जो अपने समर्थकों के अनुचित आचरण को राजनीतिक सुविधा के कारण अनदेखा करते हैं। लोकतंत्र में दोहरे मापदंडों की कोई स्थायी वैधता नहीं होती। जो व्यवहार आज अपने विरोधियों के लिए अनुचित बताया जा रहा है, वही व्यवहार अपने समर्थकों द्वारा किए जाने पर उचित नहीं हो सकता। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि संस्थाओं की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाकर हासिल किया गया तात्कालिक लाभ दीर्घकाल में पूरे राजनीतिक तंत्र को कमजोर करता है। भारत को ऐसी राजनीति चाहिए, जिसमें सरकार अपने निर्णयों के लिए जवाबदेह हो, विपक्ष अपने आरोपों के लिए प्रमाण प्रस्तुत करे और दोनों पक्ष नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों तथा राष्ट्रीय हितों के प्रति समान रूप से जिम्मेदार रहें। लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनाव जीतने से नहीं होती; उसके लिए राजनीतिक चरित्र, संस्थागत मर्यादा और सार्वजनिक उत्तरदायित्व भी आवश्यक हैं।
अधिकार बनाम कर्तव्य: संविधान को सुविधानुसार पढ़ने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी
भारतीय संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार देता है और साथ ही मौलिक कर्तव्यों के माध्यम से राष्ट्र तथा समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारियों की याद दिलाता है। अनुच्छेद 51क में संविधान का सम्मान करने, देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने तथा सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करने जैसे कर्तव्य वर्णित हैं। यह स्पष्ट रहना चाहिए कि संविधान ने मौलिक कर्तव्यों को मौलिक अधिकारों से कानूनी रूप से अधिक प्राथमिकता नहीं दी है। दोनों की अपनी संवैधानिक भूमिका है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में वे एक-दूसरे के पूरक हैं। अधिकारों के बिना नागरिक स्वतंत्रता अधूरी है और जिम्मेदारी के बिना स्वतंत्रता का विवेकपूर्ण उपयोग कठिन हो जाता है। किसी नागरिक को अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार है, लेकिन उसे सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करने, दूसरों के अधिकारों का हनन करने या कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिलता। इसी प्रकार सरकार मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख करके नागरिकों की वैध असहमति को दबा नहीं सकती। संविधान का सम्मान केवल भाषणों में उसकी प्रशंसा करने से सिद्ध नहीं होता; वह हमारे व्यवहार, सार्वजनिक आचरण और दूसरों के अधिकारों के प्रति सम्मान से प्रकट होता है। स्वामी विवेकानंद का चरित्र निर्माण पर जोर, महात्मा गांधी का साधन और साध्य की शुचिता पर आग्रह, सुभाषचंद्र बोस का राष्ट्र के प्रति समर्पण और भगत सिंह का अन्याय के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष हमें यही याद दिलाते हैं कि बड़े उद्देश्य केवल नारों से हासिल नहीं होते। उनके लिए साहस के साथ अनुशासन, स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और विरोध के साथ नैतिकता भी आवश्यक है। इन महापुरुषों के नाम लेने से पहले हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या हम उनके विचारों के अनुरूप आचरण कर रहे हैं। राष्ट्रभक्ति का वास्तविक मूल्य प्रदर्शन की तीव्रता से नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति हमारे उत्तरदायित्व और कर्म की गुणवत्ता से तय होता है।
भारत का धैर्य कमजोरी नहीं: राष्ट्रहित से खिलवाड़ की कसौटी सबके लिए समान
भारत लगभग 140 करोड़ नागरिकों का देश है। इतनी विशाल जनसंख्या वाले राष्ट्र में मतभेद स्वाभाविक हैं और राजनीतिक असहमति लोकतंत्र की अनिवार्य विशेषता है। भारतीय समाज की विविधता उसकी शक्ति है, लेकिन इस विविधता को स्थायी टकराव में बदलने के प्रयासों से सावधान रहना भी आवश्यक है। जनता का धैर्य इस बात का संकेत नहीं कि वह हर परिस्थिति से अनजान है या हर गतिविधि को स्वीकार कर लेगी। नागरिक अपने अनुभवों, चुनावों, सार्वजनिक विमर्श और समय के साथ सामने आने वाले परिणामों के आधार पर अपनी राय बनाते हैं। हालांकि, किसी एक आंदोलन को पूरे देश की भावना का प्रतिनिधि मान लेना भी उतना ही अनुचित है, जितना किसी असहमति को संपूर्ण राष्ट्र के विरुद्ध घोषित कर देना। राष्ट्र की अस्मिता किसी एक राजनीतिक दल, विचारधारा या संगठन की संपत्ति नहीं है। उसकी रक्षा संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक स्वतंत्रताओं और राष्ट्रीय एकता के प्रति साझा प्रतिबद्धता से होती है। इसलिए किसी आंदोलनकारी, राजनीतिक नेता या संवैधानिक पदाधिकारी का मूल्यांकन उसकी वास्तविक भूमिका, प्रमाणों और आचरण के आधार पर होना चाहिए। सत्ता में होना किसी को निर्दोष नहीं बनाता, विपक्ष में होना किसी को दोषी नहीं बनाता और सड़क पर उतरना किसी को स्वतः जननायक नहीं बना देता। इसी तरह सरकार की आलोचना करना राष्ट्रविरोध का प्रमाण नहीं है और राष्ट्रहित का दावा करना किसी को कानून से ऊपर नहीं कर देता। भारत का इतिहास यह बताता है कि राष्ट्र का दीर्घकालिक हित व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से कहीं बड़ा है। जो भी प्रवृत्ति समाज में भय, अविश्वास और अराजकता बढ़ाती है, उसकी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। लेकिन यह समीक्षा तथ्यों, कानून और समान मानदंडों पर आधारित होनी चाहिए, न कि राजनीतिक पहचान या भावनात्मक आरोपों पर। यही दृष्टिकोण भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता को मजबूत कर सकता है।
अंतिम प्रश्न: देश को आंदोलन चाहिए या आंदोलनों के नाम पर चलने वाली राजनीति?
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि भारत में धरना-प्रदर्शन क्यों होते हैं। प्रश्न यह है कि उनके उद्देश्य, तरीके और परिणामों का मूल्यांकन किस आधार पर किया जा रहा है। जहां न्याय के रास्ते बंद हों, वहां शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र की आवश्यकता है। जहां नागरिकों की वास्तविक समस्याओं को अनसुना किया जा रहा हो, वहां जनआवाज शासन को जवाबदेह बनाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। लेकिन जहां आरोपों का स्थान प्रमाण ले लें, संवाद की जगह टकराव आ जाए और जनहित के नाम पर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाया जाने लगे, वहां समाज को सजग होना चाहिए। हर आंदोलन को षड्यंत्र कहना गलत है, लेकिन हर आंदोलन को पवित्र मान लेना भी उतना ही गलत है। हर सरकार की आलोचना आवश्यक है, लेकिन हर आरोप को सत्य मान लेना विवेक का परित्याग है। हर युवा की भागीदारी का सम्मान होना चाहिए, लेकिन युवाओं को राजनीतिक प्रचार का उपकरण बनाने की कोशिशों पर भी सवाल उठने चाहिए। सत्ता और विपक्ष दोनों को समझना होगा कि राष्ट्रहित का अर्थ अपने राजनीतिक हितों को राष्ट्रहित घोषित कर देना नहीं है। भारत को न अंधसमर्थन चाहिए, न अंधविरोध; उसे तथ्यपरक विमर्श, पारदर्शी संगठन, जिम्मेदार आंदोलन और जवाबदेह राजनीति चाहिए। अंततः किसी भी आंदोलन की असली पहचान उसके मंच, भीड़ या नारों से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य, प्रमाण, साधनों और परिणामों से तय होगी। किसी भी राजनीतिक शक्ति की असली परीक्षा उसके दावों से नहीं, बल्कि उसके आचरण से होगी। यही वह कसौटी है, जिस पर सरकार, विपक्ष, आंदोलनकारी नेतृत्व और प्रत्येक सार्वजनिक संस्था को परखा जाना चाहिए। लोकतंत्र की सच्ची जीत तब होगी, जब सड़क पर उठने वाली आवाज संविधान की मर्यादा के भीतर न्याय की मांग करे, सत्ता जनभावनाओं के प्रति जवाबदेह रहे और राजनीति राष्ट्र की संस्थाओं को कमजोर करने के बजाय उन्हें मजबूत बनाए। भारत को आंदोलनों का अराजक बाजार नहीं, विचारों, तर्कों और संवैधानिक मर्यादाओं का जीवंत लोकतंत्र बनना है। क्योंकि राष्ट्र की शक्ति शोर में नहीं, उसके नागरिकों के विवेक, चरित्र और एकजुटता में निहित होती है।