आज का भारत केवल नीतियों और क़ानूनों की प्रयोगशाला नहीं, बल्कि अपने सामाजिक संतुलन, राष्ट्रीय चेतना और ऐतिहासिक आत्मबोध की कठिन परीक्षा से गुजर रहा है। ‘सामाजिक न्याय’, ‘समावेशन’ और ‘संवैधानिक सुरक्षा’ जैसे आकर्षक शब्द यदि नीयत से कटकर सत्ता-साधना का माध्यम बन जाएँ, तो वे समाज को जोड़ने के बजाय भीतर से कमजोर करने लगते हैं। प्रश्न क़ानूनों का नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी मानसिकता का है।
सामाजिक न्याय की अवधारणा और उसका मूल उद्देश्य
सामाजिक न्याय का आशय समाज के उन वर्गों को समान अवसर उपलब्ध कराना था, जिन्हें ऐतिहासिक कारणों से वंचना झेलनी पड़ी। इसका लक्ष्य समरसता, आत्मनिर्भरता और गरिमापूर्ण सहभागिता था। किंतु जब यह अवधारणा निरंतर पहचान-आधारित राजनीति का औज़ार बन जाती है, तब न्याय का भाव कमजोर पड़ने लगता है और समाज स्थायी वर्गों में बँटने लगता है।
UGC इक्विटी एक्ट और शिक्षा का राजनीतिकरण
UGC इक्विटी एक्ट जैसे प्रावधान काग़ज़ों पर समान अवसर और समावेशन की बात करते हैं, लेकिन व्यवहार में वे योग्यता, प्रतिस्पर्धा और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को कमजोर करते प्रतीत होते हैं। शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा और भविष्य का निर्माण करती है। यदि विश्वविद्यालय पहचान-आधारित प्रयोगशालाएँ बन जाएँ, तो ज्ञान का स्थान राजनीति ले लेती है और बौद्धिक उत्कृष्टता का ह्रास होने लगता है।
आरक्षण: सुधार से राजनीतिक पूँजी तक
आरक्षण की व्यवस्था ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई के लिए लाई गई थी, लेकिन समय के साथ इसे सामाजिक सुधार के बजाय स्थायी राजनीतिक पूँजी में बदल दिया गया। जब किसी नीति को अनंतकाल तक विस्तार देने का साधन बना लिया जाता है, तो वह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि समाज को स्थायी खाँचों में बाँटने का उपकरण बन जाती है। सच्चा सामाजिक न्याय व्यक्ति को मुख्यधारा में लाता है, न कि उसे हमेशा पहचान की कतार में खड़ा रखता है।
जाति और साम्प्रदायिक राजनीति का दुष्चक्र
आज जाति और साम्प्रदायिकता सत्ता तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग बन चुकी है। भावनाओं को भड़काकर, इतिहास को तोड़-मरोड़कर और भय का वातावरण बनाकर तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन इससे राष्ट्र की आत्मा धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है। जब नागरिक एक-दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखने लगें, तब राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाई बनकर रह जाता है, जीवंत चेतना नहीं।
सत्ताधारी वर्ग की मानसिकता पर उठते प्रश्न
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि वर्तमान नीतियों का लक्ष्य वास्तविक सामाजिक न्याय है या फिर सत्ता को स्थायी बनाने की रणनीति। जब संविधान की रक्षा की बात करते हुए प्राकृतिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांतों को दरकिनार किया जाता है, तब यह न्याय नहीं, बल्कि वैचारिक छल बन जाता है। शब्दों की चमक नीयत की कमी को अधिक उजागर कर देती है।
राष्ट्रहित बनाम विभाजनकारी एजेंडा
यह शंका भी गहराती है कि क्या ऐसी नीतियाँ अनजाने में उन वैश्विक शक्तियों के एजेंडे को आगे बढ़ा रही हैं, जिनका उद्देश्य मज़बूत राष्ट्रों को भीतर से विभाजित करना है। जब समाज को निरंतर अपराधबोध, भय और पहचान-संघर्ष में उलझाए रखा जाता है, तब आत्मविश्वासी और स्वाभिमानी राष्ट्र का निर्माण असंभव हो जाता है।
शब्दों से नहीं, नीयत से न्याय
वास्तविक प्रश्न यह नहीं कि किसे कितना अधिकार मिला, बल्कि यह है कि क्या इन नीतियों से राष्ट्र की आत्मा सुरक्षित रह पा रही है। यदि सामाजिक न्याय के नाम पर अन्याय फैल रहा हो और संविधान की रक्षा के नाम पर समाज को बाँटा जा रहा हो, तो यह केवल नीतिगत भूल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र पर सीधा प्रहार है। आज आवश्यकता शब्दों की नहीं, बल्कि दूरदर्शी दृष्टि और निष्पक्ष नीयत की है।
Comments (0)