भारत का संविधान सामाजिक न्याय की भावना पर आधारित है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में ‘सामाजिक न्याय’ का अर्थ जानबूझकर संकुचित और विकृत किया जा रहा है। आरक्षण और समानता जैसे विषय, जो मूलतः वंचितों को अवसर देने के लिए थे, आज समाज को स्थायी खांचों में बांटने के औज़ार बनते दिख रहे हैं। यह चिंता का विषय है कि क्या हम असमानता खत्म कर रहे हैं या असमानता को स्थायी पहचान में बदल रहे हैं।
UGC और शिक्षा के नाम पर वैचारिक प्रयोग
हालिया वर्षों में UGC और उच्च शिक्षा से जुड़े नियमों को लेकर जिस तरह की बहस और टकराव सामने आए हैं, वे केवल शैक्षणिक नहीं हैं। शिक्षा परिसरों को वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया गया है, जहां छात्रों को ज्ञान से अधिक पहचान की राजनीति में उलझाया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालय राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला हैं या सामाजिक संघर्ष पैदा करने की नर्सरी?
कौन हैं वे विघटनकारी शक्तिया?
हर समाज में कुछ ऐसी शक्तियां होती हैं जिन्हें स्थिरता से डर लगता है। भारत में भी कुछ वैचारिक समूह और राजनीतिक हितधारक हैं, जिनकी पूरी राजनीति ‘विभाजन’ पर टिकी है। इनके लिए जाति, वर्ग, क्षेत्र और पहचान केवल साधन हैं—मकसद सत्ता, प्रभाव और वैचारिक वर्चस्व। ये शक्तियां न तो समाज का समग्र विकास चाहती हैं और न ही राष्ट्र की एकजुट चेतना को मजबूत देखना चाहती हैं।
आरक्षण: अधिकार या स्थायी पहचान का हथियार?
आरक्षण भारतीय लोकतंत्र का एक संवैधानिक औज़ार है, लेकिन इसे स्थायी राजनीतिक हथियार बना देना सबसे बड़ा खतरा है। जब हर नीति को जातीय चश्मे से देखा जाने लगता है, तब योग्यता, परिश्रम और राष्ट्रीय दायित्व पीछे छूट जाते हैं। यह स्थिति अंततः उसी वर्ग को नुकसान पहुंचाती है, जिसके नाम पर संघर्ष किया जा रहा होता है।
राष्ट्र की अस्मिता से खिलवाड़ की सीमाए
राष्ट्र की अस्मिता केवल भूगोल से नहीं बनती, वह साझा चेतना, साझा भविष्य और परस्पर विश्वास से बनती है। जब समाज के एक हिस्से को दूसरे हिस्से के खिलाफ खड़ा किया जाता है, तब राष्ट्र कमजोर होता है। सवाल यह है कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने की छूट दी जा सकती है?
समाधान टकराव नहीं, संतुलन में है
भारत को न तो सामाजिक अन्याय चाहिए और न ही सामाजिक विघटन। ज़रूरत ऐसे संतुलन की है जहां ऐतिहासिक वंचना का समाधान हो, लेकिन नई पीढ़ी को स्थायी खांचों में कैद न किया जाए। शिक्षा, संवाद और संवैधानिक मर्यादा ही वह रास्ता है, जिससे समाज भी बचेगा और राष्ट्र भी मजबूत होगा।
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