दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं—अमेरिका और चीन—के बीच लंबे समय से चल रही व्यापारिक तनातनी अब एक नई आर्थिक चाल में बदलती दिखाई दे रही है। चीन चुपचाप अमेरिकी एसेट्स से अपना धन निकालने में जुट गया है। अमेरिका की ट्रेजरी, स्टॉक, कॉरपोरेट बॉन्ड्स और अन्य सिक्योरिटीज में चीन की हिस्सेदारी अब घटकर 1.56 ट्रिलियन डॉलर रह गई है, जो लगभग 14 वर्षों में सबसे कम स्तर है। इसमें बेल्जियम के कस्टोडियल अकाउंट्स के जरिए रखी गई होल्डिंग्स भी शामिल हैं, जिन्हें अक्सर चीन की ही वास्तविक निवेश स्थिति माना जाता है। यदि इन्हें अलग कर दिया जाए तो अमेरिकी एसेट्स में चीन की वास्तविक होल्डिंग मात्र 1.16 ट्रिलियन डॉलर बचती है, जो 2008 के आर्थिक संकट के समय के स्तर के बराबर है।
अमेरिकी ट्रेजरी से दूरी बनाना क्यों जरूरी लगा चीन को
नवंबर में चीन की अमेरिकी ट्रेजरी में होल्डिंग 6.1 अरब डॉलर और गिरकर 682.6 अरब डॉलर पर आ गई, जो अक्टूबर 2008 के बाद न्यूनतम स्तर है। यह सिर्फ एक सामान्य पोर्टफोलियो समायोजन नहीं बल्कि एक गहन रणनीतिक कदम माना जा रहा है। रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था जिस तरह अस्थिर हुई है, उसने चीन को यह संदेश दिया है कि अमेरिका-नियंत्रित वित्तीय ढांचे पर अत्यधिक निर्भर रहना उसके लिए जोखिमभरा हो सकता है। इसी कारण चीन ने अपने बैंकों को भी यूएस ट्रेजरी पेपर बेचने के निर्देश दिए हैं, जिससे डॉलर-आधारित एसेट्स पर उसकी पकड़ लगातार कम होती जा रही है।
डॉलर से दूरी और वैकल्पिक आर्थिक शक्ति बनने का प्रयास
चीन जानता है कि वैश्विक पावर स्ट्रक्चर में डॉलर की सर्वाधिक निर्णायक भूमिका है। यदि वह आने वाले दशकों में अमेरिका को आर्थिक स्तर पर चुनौती देना चाहता है तो उसे डॉलर-निर्भरता घटाकर अपनी मुद्रा युआन को मजबूत बनाना होगा। अमेरिकी एसेट्स से निवेश हटाना इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन एक ऐसी लंबी रणनीति पर काम कर रहा है जिसमें वैश्विक लेन-देन में युआन की हिस्सेदारी बढ़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी आर्थिक स्वायत्तता स्थापित हो सके।
सोने पर चीन का बढ़ता भरोसा
दूसरी तरफ चीन सोने के भंडार को तेजी से बढ़ाने में जुटा है। आधिकारिक आंकड़ों में पिछले वर्ष मात्र 27 टन सोना खरीदने की बात सामने आई है, पर विशेषज्ञों का दावा है कि वास्तविक खरीद 270 टन के आसपास रही होगी। चीन सोने की गुप्त होर्डिंग ऐसे कर रहा है मानो किसी आर्थिक भूचाल की तैयारी कर रहा हो। आधिकारिक रूप से उसके पास 2,304 टन सोना है, जबकि जानकार मानते हैं कि वास्तविक भंडार इससे कहीं अधिक है। विश्लेषकों के अनुसार यदि चीन को आने वाले दशकों में दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है, तो कम-से-कम 8,000 टन से अधिक सोने का भंडार आवश्यक है, जो डॉलर के मुकाबले उसकी मुद्रा को एक ठोस आधार प्रदान करेगा।
ड्रैगन की आगे की चाल और विश्व अर्थव्यवस्था पर असर
अमेरिका से पूँजी निकालना और सोने का भंडार बढ़ाना दो समानांतर रणनीतियाँ हैं, जिनका लक्ष्य एक ही है—वैश्विक मंच पर आर्थिक प्रभुत्व की नई परिभाषा गढ़ना। चीन यह समझता है कि भविष्य की दुनिया बहुध्रुवीय होगी जहाँ आर्थिक शक्ति हथियार से भी बड़ा साधन होगी। यदि चीन डॉलर आधारित आर्थिक व्यवस्था में कम प्रभावित रहकर अपना स्वायत्त आर्थिक ढांचा मजबूत कर लेता है, तो विश्व व्यापार, मुद्रा-संतुलन और निवेश प्रवाह की दिशा पूरी तरह बदल सकती है। यह स्थिति न केवल अमेरिका और चीन को बल्कि लगभग सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करेगी।
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