भारत और यूरोपीय संघ के बीच एफटीए पर बातचीत की शुरुआत वर्ष 2007 में हुई थी। समय के साथ वैश्विक आर्थिक परिस्थितियाँ बदलीं, सरकारें बदलीं और प्राथमिकताएँ भी बदलीं, लेकिन यह वार्ता निरंतर जारी रही। अब लगभग 18 साल बाद यह ऐतिहासिक प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है, जिसे भारत के लिए अब तक का सबसे बड़ा और व्यापक व्यापार समझौता माना जा रहा है।
शिखर सम्मेलन में होगी औपचारिक घोषणा
इस महत्वपूर्ण समझौते के समापन की घोषणा दिल्ली में आयोजित भारत–यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के दौरान की जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा के साथ यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन इस वार्ता का नेतृत्व करेंगी। हालांकि, अंतिम हस्ताक्षर कानूनी जांच के बाद किसी आपसी सहमति वाली तारीख पर किए जाएंगे।
वैश्विक व्यापार में भारत की रणनीतिक बढ़त
ऐसे समय में जब अमेरिकी टैरिफ और वैश्विक व्यापार अवरोधों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार को अस्थिर किया है, भारत–ईयू एफटीए भारत को एक मजबूत वैकल्पिक व्यापार साझेदार के रूप में स्थापित करेगा। इससे भारतीय निर्यातकों को 27 यूरोपीय देशों के बड़े बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी और भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकेगा।
टैरिफ में बड़ी राहत और चरणबद्ध छूट
इस समझौते के तहत दोनों पक्ष आपसी व्यापार में अधिकांश उत्पादों पर आयात शुल्क 90 प्रतिशत तक कम या पूरी तरह समाप्त करेंगे। श्रम-आधारित क्षेत्रों जैसे कपड़ा, परिधान और जूते-चप्पल पर पहले ही दिन से टैरिफ खत्म होने की संभावना है। वहीं कुछ संवेदनशील उत्पादों पर शुल्क में कटौती पांच, सात या दस वर्षों में चरणबद्ध तरीके से की जाएगी।
अनुमोदन की प्रक्रिया और लागू होने की समयसीमा
समझौते के लागू होने के लिए यूरोपीय संघ में यूरोपीय संसद की मंजूरी आवश्यक होगी, जबकि भारत में इसे केवल केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति से लागू किया जा सकता है। इस कारण इसके प्रभावी होने में कुछ समय लग सकता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक आर्थिक लाभ को लेकर दोनों पक्षों में व्यापक सहमति है।
भारत–ईयू संबंधों में नया अध्याय
यह एफटीए केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निवेश, तकनीक, रोजगार और रणनीतिक साझेदारी को भी नई दिशा देगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समझौता भारत–यूरोपीय संघ संबंधों को एक नए, अधिक संतुलित और भविष्य-उन्मुख दौर में ले जाएगा।
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