वाटर रिसर्च नामक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, दुनिया के कई बड़े और लोकप्रिय बोतलबंद पानी ब्रांडों में ऐसे रासायनिक तत्व पाए गए हैं, जो लंबे समय तक सेवन करने पर सेहत के लिए हानिकारक हो सकते हैं। यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है, जब बोतलबंद पानी की खपत लगातार बढ़ रही है।
तेजी से बढ़ती खपत और बदलती जीवनशैली
पिछले कुछ वर्षों में बोतलबंद पानी को सुविधा, स्वच्छता और सुरक्षित विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। यात्रा, दफ्तर और घर—हर जगह इसकी मांग बढ़ी है। लेकिन इसी बढ़ती निर्भरता ने वैज्ञानिकों को यह जांचने के लिए प्रेरित किया कि क्या यह पानी वाकई उतना सुरक्षित है, जितना दावा किया जाता है।
क्या हैं डीबीपीएस और कैसे बनते हैं
अध्ययन अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलिना के रसायन और जैव-रसायन विभाग के शोधकर्ताओं ने किया। उन्होंने बताया कि पानी को पीने योग्य बनाने के लिए क्लोरीन, क्लोरामाइन, क्लोरीन डाइऑक्साइड या ओजोन जैसे रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। ये रसायन जब पानी में मौजूद प्राकृतिक ऑर्गेनिक पदार्थों, ब्रोमाइड और आयोडाइड से प्रतिक्रिया करते हैं, तो नए रासायनिक यौगिक बनते हैं, जिन्हें डाइसइंफेक्शन बाय-प्रोडक्ट्स (DBPs) कहा जाता है।
700 से ज्यादा डीबीपीएस की पहचान
शोध का उद्देश्य यह जानना था कि बोतलबंद पानी में केवल वही डीबीपीएस मौजूद हैं या नहीं, जिन पर नियम लागू हैं, या फिर ऐसे प्राथमिक और बिना-नियमबद्ध डीबीपीएस भी हैं, जिन्हें अब तक गंभीरता से नहीं परखा गया। अध्ययन में 10 लोकप्रिय बोतलबंद पानी ब्रांडों का विश्लेषण किया गया और उनकी तुलना क्लोरामिनयुक्त नल के पानी से की गई। नतीजों में 700 से अधिक डीबीपीएस की पहचान की गई।
कैंसरजनक रसायनों की मौजूदगी ने बढ़ाई चिंता
अध्ययन के अनुसार सभी जांचे गए बोतलबंद पानी ब्रांडों में डीबीपीएस मौजूद थे। इनकी मात्रा 0.01 से 22.4 माइक्रोग्राम प्रति लीटर के बीच रही, जबकि औसत मात्रा 2.6 माइक्रोग्राम पाई गई। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि डिब्रोमोएसीटोनीट्राइल जैसे अत्यधिक विषैले और संभावित कैंसरजनक डीबीपीएस भी दो ग्रॉसरी ब्रांडों में पाए गए। भले ही इनकी मात्रा कम हो, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे समय में इनका असर खतरनाक हो सकता है।
क्या बोतलबंद पानी पूरी तरह असुरक्षित है
शोधकर्ता यह भी स्पष्ट करते हैं कि बोतलबंद पानी को पूरी तरह असुरक्षित कहना सही नहीं होगा। नल के पानी की तुलना में इसमें हानिकारक रसायनों की मात्रा कम पाई गई है। फिर भी इसे पूरी तरह सुरक्षित मान लेना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है।
कड़े मानकों और जागरूकता की जरूरत
यह अध्ययन एक चेतावनी है कि शुद्धता के दावों की नियमित वैज्ञानिक जांच और सख्त गुणवत्ता मानकों की जरूरत है। उपभोक्ताओं को भी यह समझना होगा कि बोतलबंद पानी कोई जादुई समाधान नहीं है और स्वच्छ पेयजल के लिए दीर्घकालिक नीतियां और पारदर्शिता अनिवार्य है।
Comments (0)