भोपाल: मध्यप्रदेश में इंजीनियरिंग शिक्षा का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। प्लेसमेंट के घटते अवसर और पारंपरिक ब्रांचों में छात्रों की कम होती रुचि ने कई कॉलेजों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। यही वजह है कि इस साल भी कई इंजीनियरिंग कॉलेज सीटें सरेंडर करने की तैयारी में हैं।
10 साल में 64 कॉलेज बंद
प्रदेश में इंजीनियरिंग सेक्टर की हालत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीते एक दशक में 64 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो चुके हैं। पिछले साल 754 सीटें सरेंडर की गई थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही ट्रेंड जारी रहा तो आने वाले समय में और कॉलेज बंद हो सकते हैं।
सीटों में भारी गिरावट
आंकड़ों के मुताबिक, 2015-16 में मध्यप्रदेश में करीब 200 इंजीनियरिंग कॉलेज और 95 हजार सीटें थीं, जो 2025-26 में घटकर 138 कॉलेज और 74,722 सीटों तक सिमट गई हैं। यह गिरावट साफ दर्शाती है कि अब इंजीनियरिंग शिक्षा केवल संख्या नहीं, बल्कि गुणवत्ता और रोजगार पर आधारित हो गई है।
AI-ML और नई टेक्नोलॉजी की ओर झुकाव
जहां पारंपरिक ब्रांचों की मांग घट रही है, वहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग (ML) और ई-मोबिलिटी जैसी आधुनिक ब्रांचों की मांग तेजी से बढ़ रही है। कॉलेज इन कोर्सेस में सीटें बढ़ाने के लिए तकनीकी शिक्षा विभाग को प्रस्ताव भेज रहे हैं।
पारंपरिक ब्रांचों में खाली सीटें
प्रदेश में कुल 75,722 इंजीनियरिंग सीटों में से पिछले साल 20 हजार से अधिक एडमिशन केवल कंप्यूटर साइंस (CSE) में हुए। इसके उलट एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग, बायोटेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी और ई-व्हीकल्स जैसी करीब 12 ब्रांचों में सीटें लगभग खाली रहीं।
प्लेसमेंट बना सबसे बड़ा फैक्टर
अब छात्र और अभिभावक केवल उन्हीं कॉलेजों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जहां बेहतर प्लेसमेंट की संभावना हो। इसका सबसे ज्यादा असर छोटे और कम पहचान वाले कॉलेजों पर पड़ा है।
बदलती प्राथमिकताएं, बदलता भविष्य
विशेषज्ञों के मुताबिक, इंजीनियरिंग शिक्षा का फोकस अब तेजी से बदल रहा है। एक ओर जहां पुराने कोर्स खत्म हो रहे हैं, वहीं नई टेक्नोलॉजी आधारित कोर्सेस की मांग बढ़ रही है। यह बदलाव आने वाले समय में तकनीकी शिक्षा के पूरे ढांचे को प्रभावित कर सकता है।