भारत में इस समय हर साल लगभग 15 लाख नए कैंसर मरीज सामने आते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार 2045 तक यह संख्या लगभग 25 लाख तक पहुँच सकती है। यानी मरीजों की कुल संख्या में करीब 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है। इंडियन कैंसर सोसाइटी, दिल्ली ने विश्व कैंसर दिवस पर आयोजित बातचीत में यह चेतावनी देते हुए बताया कि यह बढ़ोतरी केवल चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक, आर्थिक और नीतिगत चुनौती भी होगी।
रोकथाम और शुरुआती पहचान: बचाव की सबसे मजबूत रणनीति
ICS दिल्ली की चेयरपर्सन ज्योत्सना गोविल ने कहा कि कैंसर को केवल इलाज के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि इसकी रोकथाम और शुरुआती पहचान ही बड़े पैमाने पर मृत्यु दर को कम कर सकती है। उन्होंने कहा कि बजट में कैंसर दवाओं को सस्ता करने के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इससे भी अधिक ज़रूरी है कि लोग बीमारी के उस स्टेज तक न पहुँचें जहाँ दवाएँ ही एकमात्र विकल्प बन जाएँ। जागरूकता, समय पर स्क्रीनिंग और मिथकों को दूर करने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी उन्होंने जोर दिया।
नई तकनीकें और नियमित जांच से बढ़ती उपचार सफलता
फोर्टिस मेमोरियल हॉस्पिटल के ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. नितेश रोहतगी ने बताया कि उम्र और जोखिम के आधार पर नियमित जांच करवाने से कैंसर को शुरुआती अवस्था में पकड़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि मैमोग्राफी, पैप स्मीयर, कोलोनोस्कोपी जैसे आधुनिक परीक्षणों ने कैंसर की समयपूर्व पहचान को बेहद आसान और सटीक बना दिया है। शुरुआती पहचान से इलाज की लागत कम होती है और रोगी के ठीक होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
नीतिगत कमियाँ और स्वास्थ्य असमानता: बड़ी बाधा
नीति आयोग की पूर्व निदेशक और कैंसर सर्वाइवर डॉ. उर्वशी प्रसाद ने कहा कि भारत में कैंसर से लड़ाई की सबसे बड़ी चुनौतियाँ असमानता, अपर्याप्त डेटा, उपचार की उच्च लागत और शहरी–ग्रामीण अंतर हैं। उन्होंने बताया कि कई मरीज आर्थिक कारणों से इलाज शुरू ही नहीं कर पाते या देर से अस्पताल पहुँचते हैं, जिससे रोग की गंभीरता बढ़ जाती है। उन्होंने कैंसर देखभाल को केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयास, निरंतर निवेश और बेहतर नीतिगत ढांचे की आवश्यकता बताया।
मरीजों और परिवारों पर बोझ: भावनात्मक और सामाजिक चुनौतियाँ
ICS दिल्ली की सेक्रेटरी रेनूका प्रसाद ने एक सर्वाइवर के रूप में अपने अनुभव साझा किए और बताया कि कैंसर का बोझ सिर्फ शारीरिक बीमारी तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह मरीज और परिवार दोनों को मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से प्रभावित करता है। उन्होंने संगठन के बड़े पैमाने पर किए जा रहे स्क्रीनिंग कार्यक्रमों, प्रशांति हीलिंग एवं पुनर्वास केंद्र, ‘राइज अगेंस्ट कैंसर’ ऐप और सामुदायिक पहलों के महत्व पर प्रकाश डाला।
रोकथाम को स्वास्थ्य व्यवस्था में शामिल करना जरूरी
WHO की पूर्व अधिकारी और पब्लिक हेल्थ कंसल्टेंट डॉ. मोनिका पुरी ने कहा कि कैंसर की रोकथाम, जांच और उपचार को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली का अनिवार्य हिस्सा बनाना चाहिए। उन्होंने तंबाकू और शराब से दूरी, पौष्टिक आहार, व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली को कैंसर घटाने की मुख्य कुंजी बताया। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर भी कैंसर की शुरुआती जांच सुविधाएँ उपलब्ध हों ताकि दूर-दराज के क्षेत्रों में भी लोग समय पर जांच करा सकें।
भविष्य की दिशा: तकनीक, नीति और जागरूकता का संयोजन
विशेषज्ञों की राय में भारत में कैंसर संकट को रोकने के लिए तीन चीजें सबसे महत्वपूर्ण हैं—रोकथाम की आदतें अपनाना, समय पर जांच करवाना और स्वास्थ्य नीतियों में सतत सुधार। यदि राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता, तकनीक और सरकारी सहयोग को मजबूत किया गया तो बढ़ते खतरे को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। अन्यथा 2045 तक देश को 25 लाख नए मरीजों के भारी बोझ का सामना करना पड़ सकता है।
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