मिर्गी, जिसे एपिलेप्सी कहा जाता है, दुनिया के सबसे सामान्य न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स में से एक है। इसके बावजूद भारत में इसके बारे में गलत धारणाएँ और अनावश्यक भय अब भी गहराई से मौजूद हैं। मिर्गी का दौरा पड़ने पर व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियाँ अचानक नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, जिसके कारण दृश्य डरावना लग सकता है, लेकिन स्थिति को समझकर सही कदम उठाना ही इसे संभालने का तरीका है। इसी वजह से आयुष मंत्रालय ने समाज को शिक्षित और संवेदनशील बनने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
मिर्गी एक इलाज़ योग्य स्थिति: जीवन बिल्कुल सामान्य
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो मिर्गी पूरी तरह एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है, जिसमें दिमाग की विद्युत गतिविधि असामान्य हो जाती है। अच्छी बात यह है कि समय पर निदान और नियमित दवाओं से अधिकांश मामलों में यह पूरी तरह कंट्रोल हो जाती है। हजारों लोग मिर्गी के बावजूद पढ़ाई, नौकरी, व्यवसाय, विवाह और सामाजिक जीवन में सफल होते हैं। इसलिए यह सोच कि मिर्गी व्यक्ति की क्षमताओं को सीमित कर देती है, पूरी तरह गलत है। इलाज़ की उपलब्धता के बावजूद डर और मिथक ही अधिकांश मरीजों को पीछे धकेलते हैं।
अंधविश्वास बीमारी से बड़ी समस्या कैसे बन जाता है
भारत के कई ग्रामीण और शहरी इलाकों में अब भी यह मान्यता है कि मिर्गी का संबंध बुरी आत्माओं, टनों के प्रभाव या किसी कर्मफल से है। ऐसे विश्वास न केवल चिकित्सा उपचार में देरी करवाते हैं, बल्कि मरीज और परिवार को मानसिक रूप से भी कमजोर कर देते हैं। झाड़-फूंक, धातु धारण, ताबीज़ या अन्य अवैज्ञानिक उपायों से न केवल नुकसान होता है, बल्कि कई बार मरीज की स्थिति गंभीर भी हो सकती है। जागरूकता की कमी ही सामाजिक कलंक का सबसे बड़ा कारण है।
मिर्गी के दौरान क्या करें—सही जानकारी क्यों महत्वपूर्ण
दौरे के समय व्यक्ति को सुरक्षित रखना सबसे ज़रूरी है। उसके मुंह में कुछ न डालें, उसे पकड़कर झटके रोकने की कोशिश न करें। बस उसे एक सुरक्षित स्थान पर करवट से लिटा दें और दौरा रुकने तक निगरानी करते रहें। डॉक्टरों के अनुसार 2–3 मिनट का दौरा सामान्य होता है, लेकिन लंबे या लगातार दौरे पर तुरंत मेडिकल सहायता आवश्यक है। यह ज्ञान समाज में फैले अनावश्यक भय को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।
आयुष मंत्रालय की पहल और समाज की ज़िम्मेदारी
मिर्गी दिवस के मौके पर मंत्रालय ने स्पष्ट कहा है कि मिर्गी मरीजों को सहानुभूति नहीं, बल्कि सम्मान और स्वीकृति की आवश्यकता है। समाज को यह समझना होगा कि मिर्गी कोई चरित्र दोष, कमजोरी या अभिशाप नहीं है। स्कूलों, दफ्तरों, परिवारों और सार्वजनिक स्थलों पर सकारात्मक बातचीत और वैज्ञानिक जानकारी बीमारी के प्रति दृष्टिकोण बदल सकती है। इस दिशा में मीडिया, चिकित्सा संस्थानों और सामाजिक संगठनों को भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए।
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