भारत में केन्द्र से राज्यों को मिलने वाले करों की हिस्सेदारी तय करने के पैमाने अब केवल जनसंख्या या गरीबी पर आधारित नहीं रहे, बल्कि आर्थिक क्षमता, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन, वन क्षेत्र और GDP योगदान जैसे व्यापक मानकों तक फैल चुके हैं।
कर बंटवारे के पुराने पैमाने क्यों बदले?
भारत की संघीय संरचना में वित्त आयोग राज्य वित्त और विकास का बड़ा स्तंभ है। शुरुआती आयोगों में कर बंटवारा मुख्य रूप से दो मानकों—जनसंख्या और आय-अंतर—पर आधारित था। उद्देश्य था गरीब और पिछड़े राज्यों को अधिक संसाधन देना। लेकिन जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था जटिल होती गई, आयोगों ने नए संकेतकों को शामिल किया ताकि संसाधन वितरण अधिक संतुलित, तर्कपूर्ण और प्रोत्साहन आधारित हो सके।
आय-अंतर से ‘फिस्कल कैपेसिटी डिस्टेंस’ की ओर बदलाव
11वें वित्त आयोग में सबसे बड़ा भार ‘इनकम डिस्टेंस’ को दिया गया था, जिसकी हिस्सेदारी 62.5% थी। लेकिन 13वें वित्त आयोग ने पहली बार इसे बदलते हुए ‘फिस्कल कैपेसिटी डिस्टेंस’ लागू किया। इसका उद्देश्य था—किसी राज्य की कर एकत्र करने की वास्तविक क्षमता का आकलन करना, ताकि वितरण अधिक वैज्ञानिक और न्यायसंगत हो।
16वें आयोग में यह वजन घटकर 42.5% रह गया है, जो बताता है कि अन्य सामाजिक–आर्थिक मानकों को भी बराबर महत्व दिया जा रहा है।
जनसंख्या के मानक में ऐतिहासिक बदलाव
1971 की जनगणना को लंबे समय तक आधार बनाने का उद्देश्य था—परिवार नियोजन अपनाने वाले राज्यों को दंडित न करना। 14वें आयोग से 2011 की जनगणना आंशिक रूप से शामिल की गई, और 15वें व 16वें आयोग में इसका वजन बढ़कर 17.5% तक पहुँच गया। यह बदलाव उन राज्यों के लिए महत्वपूर्ण है जहाँ आबादी बढ़ी है, क्योंकि अब उन्हें वित्तीय हिस्सेदारी में अधिक वजन मिलता है।
वन क्षेत्र, भौगोलिक विशालता और पर्यावरणीय संतुलन का बढ़ता महत्व
वन क्षेत्र को पहली बार मानक बनाने का उद्देश्य था। पर्यावरणीय संरक्षण में योगदान देने वाले राज्यों को वित्तीय प्रोत्साहन देना। आज इसका वजन 10% है, जो बताता है कि भारत की अर्थव्यवस्था में इकोलॉजिकल बैलेंस भी एक महत्वपूर्ण वित्तीय पैरामीटर बन चुका है। इसी तरह भौगोलिक क्षेत्र (Area) का वजन 7.5% से बढ़कर 15% हुआ, और 16वें आयोग में इसे 10% पर स्थिर किया गया।
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन: कम प्रजनन दर वाले राज्यों के लिए प्रोत्साहन
15वें वित्त आयोग ने एक नए पैमाने—Demographic Performance—को शामिल किया, जिसे 12.5% वेट दिया गया। यह उन राज्यों के लिए पुरस्कार है जिन्होंने बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवार नियोजन के माध्यम से जनसंख्या नियंत्रण हासिल किया।16वें आयोग ने भी इसे 10% वेट के साथ जारी रखा।
GDP योगदान का नया मानक—विवादों के केंद्र में
16वें वित्त आयोग ने पहली बार राज्यों के GDP योगदान को 10% वजन देकर शामिल किया है। इस निर्णय ने बहस छेड़ दी है, क्योंकि गरीब राज्यों का मानना है कि यह बदलाव अमीर व औद्योगिक राज्यों को अधिक लाभ पहुँचा सकता है। हालांकि आयोग का तर्क है कि यह देशों के आर्थिक इंजन को मजबूत करने की दिशा में एक आवश्यक कदम है।
संतुलन का प्रयास: समानता और दक्षता दोनों महत्वपूर्ण
कर बंटवारे की बदलती रूपरेखा यह दिखाती है कि केन्द्र सरकार अब Equity (समानता) और Efficiency (दक्षता) दोनों के बीच संतुलन बना रही है। जहाँ गरीब राज्यों को पर्याप्त संसाधन देना जरूरी है, वहीं बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को प्रोत्साहन देना भी उतना ही आवश्यक है। 11वें से 16वें वित्त आयोग तक की यात्रा इस व्यापक आर्थिक संतुलन का ही प्रतीक है।
Comments (0)