भारत ने अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की है। महाराष्ट्र के पालघर ज़िले में स्थित देश के प्रथम परमाणु ऊर्जा केंद्र Tarapur Atomic Power Station की यूनिट-1 स्वदेशी तकनीक से हुए जीर्णोद्धार के बाद फिर से 160 मेगावाट बिजली उत्पादन करने लगी है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारत अब अपने परमाणु संयंत्रों का जीवनकाल स्वयं बढ़ाने की क्षमता विकसित कर चुका है।
स्वदेशी तकनीक की शक्ति
टीएपीएस-1 का पुनर्संवर्धन पूरी तरह भारतीय वैज्ञानिकों, अभियंताओं और स्वदेशी प्रौद्योगिकी पर आधारित रहा। इस प्रयास ने न केवल रिएक्टर को नयी ऊर्जा दी बल्कि यह भी सिद्ध किया कि भारत परमाणु तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। संयंत्र के जीवनकाल विस्तार में यह उपलब्धि भारत को एशिया का पहला ऐसा देश बनाती है जिसने किसी परमाणु रिएक्टर का पुनर्जीवन बिना बाहरी तकनीकी सहायता के संभव किया है।
एशिया में नई दिशा
सन् 1969 में आरंभ हुए टीएपीएस-1 और टीएपीएस-2 सोवियत संघ के बाहर एशिया में स्थापित होने वाले पहले परमाणु रिएक्टर थे। वर्षों तक सेवा देने के बाद इन इकाइयों का जीर्णोद्धार एक चुनौती था, परंतु भारत ने इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए यह प्रमाणित किया कि उसकी वैज्ञानिक क्षमता और तकनीकी दक्षता वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी है। टीएपीएस-1 के पुनर्संचालन के बाद अब टीएपीएस-2 का जीर्णोद्धार भी शीघ्र पूरा होने वाला है।
परमाणु रिएक्टरों की आयु और भारत की पहल
सामान्यतः किसी परमाणु रिएक्टर की उपयोगी आयु 40 से 50 वर्ष मानी जाती है। इसके बाद अधिकांश देश अपने संयंत्रों को निष्क्रिय कर देते हैं। किंतु भारत ने 1969 में आरंभ हुए इन रिएक्टरों को 57 वर्षों की सेवा के बाद भारतीय तकनीक के सहारे फिर से दीर्घायु प्रदान कर दी है। यह पहल भारत की ऊर्जा सुरक्षा और प्रौद्योगिकीय स्वावलंबन में नया अध्याय जोड़ती है।
अगले 15–20 वर्षों तक फिर सेवा देंगे टीएपीएस-1 और टीएपीएस-2
जीर्णोद्धार के बाद अब दोनों रिएक्टर आगामी 15 से 20 वर्षों तक देश के लिए विद्युत उत्पादन करते रहेंगे। यह उपलब्धि भारत के स्वच्छ, विश्वसनीय और स्थायी ऊर्जा स्रोतों के भविष्य को मज़बूती प्रदान करती है। भारतीय वैज्ञानिकों की गुणवत्ता, निरंतर सीखने की क्षमता और उत्कृष्ट तकनीकी निपुणता ने इस उपलब्धि को संभव बनाया है।
आत्मनिर्भरता और तकनीकी नवाचार की यात्रा
टीएपीएस की यात्रा केवल एक रिएक्टर के लंबे जीवन की नहीं, बल्कि भारत की निरंतर प्रगति, आत्मनिर्भरता और नवाचार की कहानी है। भारत ने दिखा दिया है कि वह केवल नए परमाणु संयंत्र बनाने में ही नहीं, बल्कि पुराने संयंत्रों को नयी क्षमता देकर वैश्विक मानकों को चुनौती देने में भी समर्थ है। यह उपलब्धि ऊर्जा क्षेत्र में भारत की स्वदेशी ताकत और क्षमता का सशक्त प्रमाण है।
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