सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष देश में सरसों की बोआई 89.36 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष यह 86.57 लाख हेक्टेयर थी। इस तरह रकबे में 3.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यदि सामान्य सरसों रकबे 79.17 लाख हेक्टेयर से तुलना करें, तो यह बढ़ोतरी लगभग 12.5 प्रतिशत बैठती है। यह स्पष्ट संकेत है कि किसानों का रुझान एक बार फिर सरसों की ओर बढ़ा है।
प्रमुख राज्यों में खेती का मिला-जुला रुझान
केडिया एडवाइजरी की रिपोर्ट के अनुसार सरसों उत्पादक राज्यों में अलग-अलग रुझान देखने को मिले हैं। राजस्थान में रकबा मामूली बढ़कर 35.35 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो देश का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बना हुआ है। मध्य प्रदेश में सरसों के रकबे में 41 प्रतिशत की बड़ी छलांग लगते हुए यह 11.79 लाख हेक्टेयर हो गया है। उत्तर प्रदेश में पिछले एक दशक में सरसों का रकबा लगभग तीन गुना बढ़कर 16.99 लाख हेक्टेयर तक पहुंचना किसानों के बदलते फसल चयन को दर्शाता है।
कुछ राज्यों में घटा रकबा, चिंता भी बरकरार
जहां कई राज्यों में बढ़ोतरी देखी गई, वहीं असम में सरसों का रकबा घटकर 2.88 लाख हेक्टेयर और झारखंड में 3.52 लाख हेक्टेयर रह गया है। इन क्षेत्रों में मौसम, स्थानीय परिस्थितियां और फसल विकल्पों की उपलब्धता किसानों के फैसले को प्रभावित कर रही है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर इसका असर सीमित रहने की उम्मीद है।
उत्पादन में 10 प्रतिशत बढ़ोतरी की प्रबल संभावना
केडिया एडवाइजरी के अनुमान के अनुसार 2025–26 में देश में सरसों का उत्पादन लगभग 10 प्रतिशत बढ़ सकता है। अधिक बोआई और अब तक फसल की अनुकूल स्थिति इसके मुख्य कारण बताए जा रहे हैं। सरकार ने इस साल सरसों उत्पादन का लक्ष्य 139 लाख टन रखा है, जबकि 2024–25 में उत्पादन 126.67 लाख टन रहा था। यह लक्ष्य तिलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
मौसम बना किसानों का सबसे बड़ा सहायक
तिलहन उद्योग संगठन COOIT के चेयरमैन सुरेश नागपाल के अनुसार इस बार सर्दी सरसों की फसल के लिए बेहद अनुकूल रही है। हालिया बारिश से फसल को लाभ मिलने की उम्मीद है और अब तक पाला न पड़ने से किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं है। यदि आने वाले हफ्तों में मौसम इसी तरह अनुकूल रहा, तो उत्पादन ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच सकता है।
रिकॉर्ड उत्पादन की ओर बढ़ती सरसों
उद्योग से जुड़े अनुमानों के मुताबिक इस साल सरसों का उत्पादन 120 लाख टन तक पहुंच सकता है, जो अब तक का उच्चतम स्तर होगा। इससे पहले वर्ष 2023 में 115 लाख टन का रिकॉर्ड बना था, जबकि पिछले साल उत्पादन घटकर 111 लाख टन रह गया था। यह बढ़ोतरी किसानों की आय और खाद्य तेल आत्मनिर्भरता दोनों के लिए राहत लेकर आ सकती है।
ओलावृष्टि से बढ़ी सतर्कता की जरूरत
हालांकि अब तक हालात अनुकूल हैं, लेकिन कुछ इलाकों में ओलावृष्टि की आशंका किसानों की चिंता बढ़ा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश सरसों उत्पादक क्षेत्रों में हल्की से मध्यम बारिश और अनुकूल तापमान फिलहाल फसल के लिए सहायक बने हुए हैं। फिर भी मौसम पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा।
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