सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशीय पीठ ने यह निर्णय सुनाते हुए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया कि किसी भी महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ माँ बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि नाबालिग लड़की अपने जीवन, शरीर और भविष्य से संबंधित फैसले लेने का पूरा अधिकार रखती है और समाज या कानून उसे ऐसी परिस्थिति में धकेलने का अधिकार नहीं रखता जिसे वह स्वयं स्वीकार करने को तैयार नहीं।
नाबालिग की मानसिक व शारीरिक स्थिति को आधार बनाया गया
पीठ ने अपने निर्णय में पीड़िता की असहायता और मानसिक स्थिति को गंभीरता से समझा। अदालत ने कहा कि जब कोई लड़की मानसिक रूप से मातृत्व का भार उठाने के लिए तैयार नहीं है, तो उसे मजबूरी में गर्भ धारण रखने को कहना उसके संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन होगा। निर्णय में यह भी उल्लेख किया गया कि गर्भ ठहरने की परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, लेकिन वह लड़की के भविष्य को प्रभावित करने का आधार नहीं बन सकतीं।
कानूनी सीमाएँ और मानवीय दृष्टिकोण का संतुलन
अदालत के समक्ष यह एक जटिल स्थिति थी क्योंकि आमतौर पर कानून 24 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति देता है। लेकिन न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि सिर्फ समयसीमा के आधार पर किसी लड़की को मातृत्व के लिए मजबूर करना न्याय की आत्मा के विरुद्ध है। अदालत ने कहा कि जब नाबालिग स्वयं साफ तौर पर कह रही है कि वह माँ नहीं बनना चाहती, तो कानून को उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।
अस्पताल को सुरक्षित मेडिकल प्रक्रिया का आदेश
मुंबई के जेजे अस्पताल को निर्देश दिया गया कि वह पूरी सुरक्षा और विशेषज्ञ निगरानी में गर्भपात की प्रक्रिया संपन्न करे। अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि पीड़िता को किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक पीड़ा न हो और पूरी प्रक्रिया उसे विश्वास, सुरक्षा और सम्मान की भावना के साथ उपलब्ध कराई जाए।
महिला की स्वतंत्रता को सर्वोच्च मानने का संदेश
इस निर्णय ने यह स्थापित कर दिया कि भारतीय न्यायपालिका महिला की जीवन-चयन स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानती है। न्यायालय का संदेश बेहद स्पष्ट है कि किसी भी परिस्थिति में महिला की इच्छा को दरकिनार नहीं किया जा सकता और मातृत्व अपनाना या न अपनाना पूरी तरह महिलाओं का व्यक्तिगत अधिकार है। यह फैसला आने वाले वर्षों में महिला अधिकारों की दिशा में एक मजबूत नजीर बनेगा और समानता तथा गरिमा के मूल सिद्धांतों को और मजबूत करेगा।
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