भारत की थाली में दाल सिर्फ एक व्यंजन नहीं बल्कि पौष्टिकता का मूल आधार है। वर्षों पहले लता मंगेशकर और किशोर कुमार की आवाज़ में गाए गए प्रसिद्ध गीत ‘दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ में भी दाल को सादगी और संतुलित भोजन की पहचान बताया गया था। लेकिन आज महंगाई और लगातार घटते उत्पादन के कारण दालें आम लोगों की थाली से दूर होती जा रही हैं। ऐसे समय में विश्व दलहन दिवस यह याद दिलाता है कि पोषण का यह महत्वपूर्ण स्रोत हमारे भोजन का अविभाज्य हिस्सा क्यों होना चाहिए और इसे बचाने के लिए कौन-से कदम जरूरी हैं।
भारत में दलहन की बढ़ती आवश्यकता और बदलती स्थिति
देश में प्रोटीन की सबसे सुलभ और सस्ती आपूर्ति दालों से होती है, लेकिन पिछले वर्षों में दालों का उत्पादन तेजी से घटा है। मूंग को छोड़ अधिकांश दालों की पैदावार में गिरावट आई है, जिसके कारण बाजार में दालें महंगी हो गई हैं। आम उपभोक्ता की थाली में दालों की मात्रा घटने लगी है और प्रोटीन की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। यह स्थिति विशेष चिंता का विषय है क्योंकि भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में पौष्टिकता का सबसे बड़ा आधार दलहन ही है।
मध्य प्रदेश का नेतृत्व और सरकार के लक्ष्य
दलहन उत्पादन में मध्य प्रदेश देश का अगुवा राज्य है। किसानों में जागरूकता लाने और उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से प्रदेश इस वर्ष ‘कृषक कल्याण वर्ष’ को ‘बीज से बाजार तक’ की थीम पर मना रहा है। वहीं केंद्र सरकार ने वर्ष 2030 तक देश में 350 लाख टन दलहन उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है ताकि दालों के आयात पर निर्भरता समाप्त हो सके। वर्तमान में बड़ी मात्रा में दालें विदेशों से मंगाई जाती हैं, जो घरेलू कीमतों पर भी सीधा असर डालती हैं।
दालों को करमुक्त करने और मिलों का विस्तार करने की पहल
सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के उद्देश्य से कई दालों को करमुक्त किया है। साथ ही यह योजना भी बनाई गई है कि देशभर में एक हजार से अधिक नई दाल मिलें स्थापित की जाएं, जिससे स्थानीय स्तर पर उत्पादन को प्रसंस्करण की सुविधाएं मिल सकें। यह कदम किसानों को दलहन फसलें बोने के लिए प्रेरित करेगा और बाजार में स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित कर सकेगा।
विश्व दलहन दिवस का इतिहास और महत्व
विश्व दलहन दिवस को वर्ष 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा मान्यता दी गई थी। तय किया गया कि 10 फरवरी को हर वर्ष इस दिवस को मनाया जाएगा। यह दिवस दुनिया को दालों के पोषण मूल्य, स्वास्थ्य लाभ और कुपोषण से लड़ने में उनकी भूमिका के प्रति जागरूक करने का अवसर प्रदान करता है। दालों में मौजूद प्रोटीन, फाइबर और सूक्ष्म पोषक तत्व उन्हें वैश्विक खाद्य सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाते हैं।
पोषण, कृषि और भविष्य का संतुलन
दालें जहां कुपोषण रोकने में सहायक हैं, वहीं मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी योगदान देती हैं। ऐसे में दलहन उत्पादन की कमी न केवल पोषण बल्कि कृषि के लिए भी चुनौती है। अतः आवश्यक है कि सरकार और समाज मिलकर दाल उत्पादन को बढ़ावा दें, किसानों को प्रोत्साहन दें और महंगाई पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाए।
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