कोलकाता डेस्क: नवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। भक्त पूरे नौ दिनों तक व्रत रखते हैं और मां दुर्गा से सुख, समृद्धि, आरोग्य और खुशहाली की कामना करते हैं। शारदीय नवरात्रि की शुरुआत कलश स्थापना के साथ होती है, जिसे घटस्थापना भी कहा जाता है। इस दिन शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है।
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त: सुबह 6:19 से 10:12 बजे तक
पंचांग के अनुसार, 11 अक्टूबर 2026, रविवार को कलश स्थापना का मुख्य शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक रहेगा। इस दौरान श्रद्धालु घटस्थापना कर नवरात्रि की पूजा शुरू कर सकते हैं। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त में सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक कलश स्थापना का विकल्प भी बताया गया है। हालांकि, मुहूर्त की गणना स्थान के अनुसार अलग हो सकती है, इसलिए स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।

कलश स्थापना के लिए कौन-कौन सी सामग्री जरूरी?
नवरात्रि की पूजा में किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए पूजा सामग्री पहले से तैयार कर लेना बेहतर रहता है। कलश स्थापना के लिए मिट्टी का पात्र, साफ मिट्टी, जौ, जल, कलश, आम के पत्ते, नारियल, लाल कपड़ा, रोली, अक्षत, फूल, लाल चुनरी, सुपारी, सिक्का, गंगाजल, धूप, दीपक, घी और कपूर रख लें। मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा, फल और मिठाई जैसी भोग सामग्री भी तैयार रखें।
कलश स्थापना की पूजा विधि क्या है?
नवरात्रि के पहले दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनें और पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। एक पात्र में मिट्टी भरकर उसमें जौ बोएं। फिर कलश में जल भरकर उसमें परंपरा के अनुसार रोली, अक्षत, सुपारी और सिक्का डालें। कलश के मुख पर आम के पत्ते लगाकर ऊपर नारियल स्थापित करें। इसके बाद कलश को जौ वाले पात्र के पास रखकर पूजा का संकल्प लें।
कलश स्थापना के बाद मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री का ध्यान करें। देवी को फूल, अक्षत, फल और भोग अर्पित करें। धूप-दीप जलाकर आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें। यदि अखंड ज्योति जला रहे हैं, तो उसकी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें।
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की होगी पूजा
नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें शक्ति, दृढ़ संकल्प और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। भक्त मां शैलपुत्री को फूल, फल और भोग अर्पित कर सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं। इसके बाद अगले आठ दिनों तक मां दुर्गा के अन्य स्वरूपों की पूजा की जाती है।
इस बार हाथी पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान के वाहन का निर्धारण सप्ताह के दिन के आधार पर किया जाता है। इस वर्ष शारदीय नवरात्रि की शुरुआत रविवार से होने के कारण मां दुर्गा का आगमन हाथी पर माना जा रहा है। परंपरा में हाथी को सुख-समृद्धि और अच्छी वर्षा का प्रतीक माना जाता है। वहीं, मां के प्रस्थान के वाहन को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इन मान्यताओं को आस्था और ज्योतिषीय परंपरा के संदर्भ में देखा जाता है।

नवरात्रि के नौ दिनों में किस देवी की होगी पूजा?
शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस वर्ष तिथियों के अनुसार पूजा का क्रम इस प्रकार रहेगा:
- 11 अक्टूबर: मां शैलपुत्री
- 12 अक्टूबर: मां ब्रह्मचारिणी
- 13 अक्टूबर: मां चंद्रघंटा
- 14 अक्टूबर: मां कूष्मांडा
- 15 अक्टूबर: मां स्कंदमाता
- 16 अक्टूबर: मां कात्यायनी
- 17 अक्टूबर: मां कालरात्रि
- 18 अक्टूबर: मां महागौरी
- 19 अक्टूबर: मां सिद्धिदात्री
नौ दिनों की पूजा के बाद 20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा।
नवरात्रि की पूजा में इन बातों का रखें ध्यान
नवरात्रि के दौरान पूजा स्थल को साफ रखें और अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा-व्रत करें। व्रत रखने वाले लोग अपनी सेहत का ध्यान रखते हुए खानपान तय करें। कलश स्थापना के बाद नियमित रूप से पूजा और आरती करने की परंपरा है। अष्टमी या नवमी के दिन कई परिवारों में कन्या पूजन भी किया जाता है। यदि घर में अखंड ज्योति जलाई जाती है, तो उसे सुरक्षित स्थान पर रखें और जलते दीपक को कभी भी बिना निगरानी के न छोड़ें।