यह काफी सुंदर विरोधाभास है कि मां जितनी कोमल होती है उतनी ही कठोर भी होती है। यह रिश्ता प्रेम और सम्मान का है। सृष्टि की कल्पना बगैर मां के नहीं की जा सकती है। मां यानी माता के रूप में नारी जो धरती पर अपने सबसे पवित्रतम रूप में है। मां को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है क्योंकि ईश्वर की जन्मदात्री भी नारी ही रही है। इसलिए नारी का सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ब्रह्मांड में मां ही ऐसी शक्ति है जो बिना कहे जान जाती है कि बच्चे को क्या चाहिए। बशर्ते बच्चे के मन में वह निश्चल भाव हो प्रेम हो और सत्य हो। ये गुण आपके भीतर हैं तो मां से कुछ मांगने की जरूरत ही नहीं है वह स्वयं आपको आवश्यकता की हर चीज देंगी।
प्रेम से मांगें शर्तों से नहीं
यदि जिद करेंगे तो भी मां तभी देंगी जब उपयुक्त लगेगा। मगर कुछ ऐसे भी हैं जो हक से ज्यादा मांगना चाहते हैं और कहते हैं कि मैं यह करूंगा तो आप मुझे यह वस्तु देंगी। यह तो शर्त हो गई। मां को कभी शर्तों में ना बांधें वो व्यापारी नहीं हैं। उन्हें सिर्फ प्रेम से ही जीता जा सकता है। मामला जब शर्तों का आ जाता है तो सावधानी ज्यादा रखनी पड़ती है क्योंकि अनुबंध की शर्तें पूरी नहीं हुईं तो दंड भी भोगना पड़ सकता है। इसलिए मां से जो मांगना है प्रेम से मांगिए। जिद तो किसी भी मां को अच्छी नहीं लगती। निश्चल भाव और सच्चे प्रेम से ही मां की कृपा प्राप्त होती है।
नवरात्रि शक्ति की उपासना के दिन
शक्ति की उपासना के नौ दिन हैं नवरात्र। मां दुर्गा से शक्ति और सिद्धि की कामना रखने वाले तरह-तरह के कठिन व्रत करते हैं। कई रास्ते हैं जो शक्ति की सिद्धि तक ले जाते हैं। फिर भी हम कहीं तो चूक कर रहे हैं। कुछ ऐसा है जो भूल रहे हैं। कहीं कोई त्रुटि जरूर हो रही है जो नवरात्रों की इतनी साधना के बाद भी शक्ति के दर्शन से हम कुछ कदम दूर रह जाते हैं। शायद संकल्प का अभाव। लोग नौ दिनों तक वो सारे काम छोड़ देते हैं जो भक्ति में बुरे माने जाते हैं। लेकिन केवल अस्थायी संयम से स्थायी सिद्धि नहीं मिलती।
संकल्प की आवश्यकता
नौ दिन तक सारी बुरी आदतें छोड़ दीं लेकिन दसवें दिन से सब फिर से शुरू। नौ दिन में जो कमाया वो दसवें दिन से गंवाने की प्रक्रिया में जुट जाते हैं। संकल्प लेना होगा कि जो दुर्व्यसन इस नवरात्र में छोड़ेंगे वे फिर कभी शुरू नहीं होंगे। सिर्फ नौ दिन अपने आप पर कई प्रतिबंध लगाकर देवी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। अगर फिर से उन्हें शुरू ही करना है तो नौ दिन उन्हें छोड़ना और संयम बरतना ढोंग है। सच्चा संकल्प जीवन भर के परिवर्तन का आधार बनता है।
सद्भाव और स्थायी साधना
नवरात्रि केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं बल्कि आंतरिक शुद्धता और सद्भाव का अवसर है। मां दुर्गा की आराधना से शक्ति मिलती है लेकिन वह शक्ति संयम और निरंतर साधना से ही स्थायी बनती है। प्रेम सम्मान और निश्चल भाव से मां की कृपा सहज प्राप्त होती है। शर्तों और जिद से दूर रहकर सच्चे समर्पण से ही सिद्धि मिलती है। नवरात्रि का संदेश स्पष्ट है कि नौ दिन की साधना को जीवन का अंग बनाएं। शक्ति संयम और सद्भाव के साथ ही यह पर्व सार्थक सिद्ध होता है।