New Delhi | पितृपक्ष का अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या होता है। इसे महालया अमावस्या और विसर्जनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पितृपक्ष के दौरान धरती पर आए पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक विदाई दी जाती है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए भी इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है। साल 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को पड़ रही है। इस दिन पूर्वजों की शांति और उनकी स्मृति में श्राद्ध, तर्पण, दान-पुण्य और अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या 2026 की तिथि और समय
पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 10 अक्टूबर 2026 को सुबह 7:22 बजे शुरू होगी और 11 अक्टूबर 2026 को सुबह 5:28 बजे समाप्त होगी। हालांकि, श्राद्ध कर्म के लिए पूरे दिन का समय समान रूप से शुभ नहीं माना जाता। धार्मिक परंपरा में कुतुप, रोहिण और अपराह्न काल को श्राद्ध कर्म के लिए विशेष महत्व दिया गया है।
श्राद्ध और तर्पण के शुभ मुहूर्त
- कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक
- रोहिण मुहूर्त: दोपहर 12:31 बजे से 1:17 बजे तक
- अपराह्न काल: दोपहर 1:18 बजे से 3:37 बजे तक
- इस प्रकार श्राद्ध और तर्पण के लिए मुख्य समय लगभग सुबह 11:45 बजे से दोपहर 3:37 बजे तक रहेगा।
सर्वपितृ अमावस्या पर क्यों किया जाता है श्राद्ध?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों का स्मरण और उनके निमित्त श्राद्ध-तर्पण किया जाता है। सर्वपितृ अमावस्या को विशेष रूप से उन पितरों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध किसी कारण से पितृपक्ष के अन्य दिनों में नहीं हो पाया। इस दिन सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों के नाम से तर्पण करने की परंपरा है। मान्यता है कि श्रद्धा से किए गए कर्म से पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त होती है।
सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध-तर्पण की विधि
1. स्नान और संकल्प
श्राद्ध कर्म करने वाला व्यक्ति सुबह स्नान कर स्वच्छ और सात्विक वस्त्र धारण करे। इसके बाद पूर्वजों का ध्यान करते हुए श्रद्धापूर्वक श्राद्ध और तर्पण का संकल्प लिया जाता है।
2. पितरों को तर्पण
शुभ समय में कुश और काले तिल का प्रयोग करते हुए जल अर्पित किया जाता है। तर्पण के दौरान अपने पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार तर्पण के लिए दोपहर का समय विशेष माना गया है।
3. पंचबलि के लिए भोजन
श्राद्ध का भोजन तैयार होने के बाद पंचबलि की परंपरा के अनुसार भोजन का कुछ हिस्सा अलग निकाला जाता है। इसमें देव, गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों के लिए भोजन अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।
4. ब्राह्मण भोजन और दान
इसके बाद ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक सात्विक भोजन कराने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, तिल या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करने की परंपरा है।
दान करते समय अपनी क्षमता और श्रद्धा का ध्यान रखना चाहिए।
5. शाम को दीपक जलाने की परंपरा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, शाम के समय घर के मुख्य द्वार या पीपल के पेड़ के नीचे पितरों के नाम से दीपक जलाया जाता है। इसके साथ परिवार की सुख-शांति और पूर्वजों की सद्गति की प्रार्थना की जाती है।
सर्वपितृ अमावस्या पर इन बातों का रखें ध्यान
- श्राद्ध और तर्पण के लिए दोपहर के निर्धारित मुहूर्त को प्राथमिकता दें।
- तर्पण में कुश और काले तिल का इस्तेमाल परंपरा के अनुसार किया जाता है।
- पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें।
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र और तिल आदि का दान करें।
- गाय, कुत्ते और कौए सहित जीव-जंतुओं के लिए भोजन निकालने की परंपरा निभाई जाती है।
- धार्मिक कर्म करते समय सात्विकता और श्रद्धा बनाए रखें।
किन समयों में श्राद्ध करने से बचते हैं?
धार्मिक परंपराओं में श्राद्ध कर्म के लिए प्रातःकाल, संध्याकाल और सूर्यास्त के बाद का समय उपयुक्त नहीं माना जाता। इसलिए श्राद्ध और तर्पण के लिए कुतुप, रोहिण तथा अपराह्न काल को प्राथमिकता दी जाती है।
ध्यान दें: ऊपर बताए गए नियम और फल धार्मिक मान्यताओं एवं परंपराओं पर आधारित हैं। अलग-अलग पंचांग और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार मुहूर्त या विधि में थोड़ा अंतर हो सकता है।