धर्मेंद्र हिंदी सिनेमा के उन विरले कलाकारों में से थे, जिन्होंने अपने अभिनय से कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। रोमांटिक हीरो से लेकर एक्शन स्टार और संजीदा चरित्र अभिनेता तक, उन्होंने हर भूमिका में जान डाल दी। ‘शोले’, ‘फूल और पत्थर’, ‘धरती कहे पुकार के’ और ‘सत्यकाम’ जैसी फिल्मों में उनका अभिनय आज भी उतना ही जीवंत है। उनका सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि भावनाओं की गहरी अभिव्यक्ति था।
पद्म विभूषण की घोषणा और राष्ट्र की कृतज्ञता
रविवार को सरकार द्वारा मरणोपरांत पद्म विभूषण सम्मान की घोषणा के साथ यह स्पष्ट हो गया कि धर्मेंद्र का योगदान समय की सीमाओं से परे है। यह सम्मान भारतीय सिनेमा में उनके दशकों लंबे समर्पण और प्रभाव को आधिकारिक मान्यता देता है। कला के क्षेत्र में यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान उनके व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों को सम्मानित करता है।
हेमा मालिनी की भावुक प्रतिक्रिया: गर्व और पीड़ा का संगम
पत्नी और अभिनेत्री हेमा मालिनी ने सोशल मीडिया पर धर्मेंद्र की तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि सरकार द्वारा उनके योगदान को पहचानना गर्व की बात है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि काश यह सम्मान उन्हें पहले मिल जाता, जब वह स्वयं इसे ग्रहण करने के लिए हमारे साथ होते। इस भावना में एक पत्नी का प्रेम, एक कलाकार का सम्मान और एक परिवार की अधूरी इच्छा साफ झलकती है।
परिवार और प्रशंसकों की भावनाएँ: एक साझा उत्सव
इंडिया टुडे से बातचीत में हेमा मालिनी ने बताया कि पूरा परिवार इस सम्मान से बेहद खुश और उत्साहित है। उन्होंने कहा कि धर्मेंद्र कभी पुरस्कारों के पीछे नहीं भागे, फिर भी जनता और इंडस्ट्री से उन्हें जो अपार प्रेम मिला, वही उनका सबसे बड़ा पुरस्कार था। आज जब हर तरफ से उनके लिए सम्मान और सराहना आ रही है, तो यह पूरे परिवार के लिए भावनात्मक क्षण है।
सिर्फ अभिनेता नहीं, एक प्रेरणा थे धर्मेंद्र
हेमा मालिनी ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्मेंद्र सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि सच्चे अर्थों में कलाकार थे। उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाकर यह साबित किया कि अभिनय सिर्फ चेहरे का नहीं, आत्मा का खेल है। उनके संघर्ष, सादगी और समर्पण ने अनगिनत युवाओं को प्रेरित किया और भारतीय सिनेमा को एक मजबूत आधार दिया।
विरासत जो अमर रहेगी
धर्मेंद्र भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी फिल्मों, संवादों और किरदारों के जरिए वह हमेशा जीवित रहेंगे। पद्म विभूषण सम्मान उनके जीवन और योगदान पर राष्ट्र की अंतिम मुहर की तरह है, जो आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा कि सच्ची कला कभी मरती नहीं।
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