लखनऊ. उत्तर प्रदेश में चुनावी हलचल तेज हो गई है। फिलहाल लोगों की नजरें राज्यसभा के चुनाव पर टिकी हुई हैं। वहीं विधानसभा चुनाव को लेकर सत्ताधारी बीजेपी के साथ विपक्ष भी अपनी रणनीति बनाने लगा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस बार बीजेपी टिकट बंटवारे में काफी सतर्क रहने वाली है। इसलिए कम से कम 100 विधायकों के टिकट पर भी खतरा मंडरा रहा है। पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षण में बहुत सारी बातें निकलकर आ रही हैं। ऐसे में अगर किसी विधायक का स्थानीय पदाधिकारियों से ज्यादा तनाव या अनबन देखा जाता है या फिर एंटी-इनकंबेंसी का फैक्टर ज्यादा है तो उसे इस बार मौका मिलने की गुंजाइश नहीं है। पार्टी आलाकमान हर पहलू पर गौर कर रही है।
आंतरिक सर्वेक्षण और जनता का भरोसा
बीजेपी के करीब 100 ऐसे विधायक हैं जिनपर जनता का भरोसा कम हो गया है। इसके साथ ही कई विधायकों का स्थानीय पदाधिकारियों से मतभेद रहता है। इसके साथ ही आरएसएस से भी विधायकों के बारे में राय ली गई है। इन सभी बातों को मिला-जुलाकर ही पार्टी आलाकमान कोई फैसला कर सकता है। सूत्रों का कहना है कि पार्टी विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से सर्वे करवा रही है। इस बार सबसे ज्यादा प्रमुखता जीत की संभावना को ही दी जा रही है। किसी राजनेता की वरिष्ठता उसके बाद आंकी जा रही है। सर्वे के नतीजे टिकट बंटवारे में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
एंटी-इनकंबेंसी का बढ़ता प्रभाव
उत्तर प्रदेश में बीजेपी की दो बार लगातार सरकार रही है। ऐसे में कई ऐसे विधायक भी हैं जो कि 10 साल से सीट पर काबिज हैं। इस वजह से एंटी-इनकंबेंसी भी देखी जा रही है। लंबे समय तक एक ही चेहरे के रहने से स्थानीय स्तर पर असंतोष पैदा होता है। पार्टी इस बात को गंभीरता से ले रही है कि 2024 के चुनाव में हुई गलतियों को दोहराना नहीं चाहती। इसलिए पुराने चेहरों के बजाय नई और जीतने योग्य छवियों पर जोर दिया जा रहा है। आंतरिक फीडबैक के आधार पर फैसला लिया जाएगा।
स्थानीय पदाधिकारियों से तनाव और आरएसएस की राय
कई विधायकों का स्थानीय पार्टी पदाधिकारियों से मतभेद लंबे समय से बना हुआ है। यह तनाव चुनावी तैयारियों में बाधा बन सकता है। आरएसएस से भी विधायकों के बारे में विस्तृत राय ली गई है ताकि जमीनी हकीकत का सही आकलन हो सके। पार्टी संगठन और विधायक के बीच तालमेल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर तालमेल न होने के कारण क्षेत्र में काम प्रभावित हो रहा है तो ऐसे विधायकों के टिकट पर संकट गहरा सकता है। आलाकमान इन सभी रिपोर्ट्स का गहन अध्ययन कर रहा है।
जीत की संभावना को सबसे ज्यादा प्राथमिकता
इस बार टिकट बंटवारे में वरिष्ठता के बजाय जीत की संभावना को सबसे ऊपर रखा जा रहा है। पार्टी का मानना है कि केवल अनुभव पर्याप्त नहीं है बल्कि क्षेत्र में लोकप्रियता और संगठन की मजबूती भी जरूरी है। आंतरिक सर्वेक्षण में जिन विधायकों का प्रदर्शन कमजोर पाया गया है उनके स्थान पर नए चेहरे लाने पर विचार चल रहा है। इससे पार्टी को एंटी-इनकंबेंसी से निपटने में मदद मिलेगी। पूरे प्रदेश में क्षेत्रवार समीक्षा जारी है ताकि सही फैसला लिया जा सके।
पार्टी की सतर्कता और आगे की रणनीति
बीजेपी 2024 वाली गलती नहीं दोहराना चाहती इसलिए टिकट बंटवारे की प्रक्रिया को पहले से अधिक पारदर्शी और सर्वे आधारित बनाने पर जोर है। विपक्ष भी अपनी बिसात बिछा रहा है ऐसे में सत्ताधारी दल कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। आलाकमान के स्तर पर अंतिम फैसला लिया जाएगा जिसमें सभी रिपोर्ट्स और फीडबैक को शामिल किया जाएगा। किसानों और आम जनता की राय को भी ध्यान में रखा जा रहा है। यह सतर्कता पार्टी को मजबूत स्थिति में रखने वाली साबित हो सकती है।