उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में अचानक फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने इस फिल्म के माध्यम से ब्राह्मण समुदाय का अपमान किए जाने पर अपनी कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि फिल्मों में किसी भी जाति या समुदाय को अपमानजनक रूप में प्रस्तुत करना न केवल असंवेदनशीलता है, बल्कि सामाजिक सौहार्द पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। मायावती ने अपने बयान में स्पष्ट कहा कि इस फिल्म के प्रदर्शन से आक्रोश बढ़ रहा है और केंद्र सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए।
ब्राह्मण समाज के रोष को बताया स्वाभाविक और जायज़
मायावती ने व्यक्त किया कि फिल्म में प्रयुक्त ‘घूसखोर पंडित’ जैसा शीर्षक और उसका जातिसूचक अंदाज पूरे ब्राह्मण समाज के लिए अत्यंत आहत करने वाला है। उनके अनुसार, यह समस्या केवल किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं रही है, बल्कि देशभर में पंडित समुदाय को गलत तरीके से निशाना बनाने की प्रवृत्ति बढ़ती दिख रही है। उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय की गरिमा को चोट पहुँचाने वाले ऐसे चित्रण सामाजिक असंतोष को जन्म देते हैं और यह आक्रोश बिल्कुल स्वाभाविक है।
सामाजिक सौहार्द पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता
मायावती ने आगे कहा कि फिल्मों और मनोरंजन माध्यमों की जिम्मेदारी केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे समाज में सोच और दृष्टिकोण को भी प्रभावित करते हैं। जातिगत अपमानजनक प्रस्तुति न केवल एक वर्ग विशेष के प्रति पूर्वाग्रह को बढ़ाती है, बल्कि समाज के भीतर अविश्वास और तनाव भी गहरा कर सकती है। उन्होंने चेताया कि अगर ऐसी प्रवृत्तियों पर लगाम नहीं लगी तो यह सांप्रदायिक और सामाजिक संतुलन की दृष्टि से खतरनाक साबित हो सकती है।
केंद्र सरकार से प्रतिबंध की सीधी मांग
अपने बयान में मायावती ने यह भी कहा कि बसपा किसी भी वर्ग विशेष के खिलाफ भेदभावपूर्ण और अपमानजनक सामग्री का हमेशा विरोध करती रही है। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि ‘घूसखोर पंडित’ जैसी जातिसूचक फिल्म पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाए ताकि ऐसे आपत्तिजनक संदेशों के प्रसार को रोका जा सके। उनके अनुसार, यदि सरकार इस मामले में कठोर कदम उठाती है तो यह समाज में सकारात्मक संदेश भेजेगा और सभी समुदायों के सम्मान की रक्षा सुनिश्चित करेगा।
राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में नया मोड़
इस विवाद ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक वातावरण में नई हलचल पैदा कर दी है। ब्राह्मण समाज के विभिन्न संगठनों और सामाजिक समूहों ने भी फिल्म के विरोध में आवाज उठाई है, जिससे यह मुद्दा और व्यापक रूप ले चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह प्रकरण राज्य की राजनीति के एजेंडे पर प्रमुखता से उभर सकता है, क्योंकि सम्मान और पहचान का प्रश्न सीधे सामाजिक भावनाओं से जुड़ा होता है। मायावती द्वारा केंद्र सरकार को दिए गए इस संदेश से स्पष्ट है कि यह विवाद अब केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक मर्यादा और संवेदनशीलता का वृहद मुद्दा बन चुका है।
सामाजिक सम्मान की रक्षा को बताया सर्वोच्च आवश्यकता
मायावती के बयान ने एक बार फिर इस प्रश्न को महत्वपूर्ण बना दिया है कि मनोरंजन माध्यमों को किस हद तक जिम्मेदारी निभानी चाहिए। किसी भी समुदाय का अपमान समाज के ताने-बाने को कमजोर करता है और आपसी विश्वास को चोट पहुँचाता है। इसी कारण उन्होंने फिल्म पर रोक लगाने की मांग को उचित ठहराया और इसे सामाजिक सम्मान की रक्षा का आवश्यक कदम बताया। यह विवाद फिलहाल जारी है, लेकिन निश्चित रूप से इसने समाज में संवेदनशील विषयों पर गहरी चर्चा को जन्म दे दिया है।
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