कहा जाता है कि काशी के कण-कण में महादेव का वास है। दिव्यता का ऐसा प्रवाह विश्व में कहीं और नहीं मिलता, क्योंकि बाबा विश्वनाथ का मंदिर केवल उपासना का स्थान नहीं, बल्कि शिव के सार्वभौमिक स्वरूप का जीवंत केंद्र है। यहाँ प्रतिदिन होने वाली पाँच आरतियाँ सृष्टि की पाँच अवस्थाओं का प्रतीक हैं—उदय, पोषण, संरक्षण, आनंद और विलय। इन आरतियों में सहभागी बनने वाला भक्त केवल दर्शन नहीं करता, बल्कि एक अनूठी आध्यात्मिक यात्रा में प्रवेश करता है जहाँ आत्मा शिव से संवाद करती है और अस्तित्व का हर बंधन क्षीण होने लगता है।
मंगला आरती: सृष्टि का आरंभ और चेतना का जागरण
भोर की प्रथम किरणों के साथ होने वाली मंगला आरती वह क्षण है जब भगवान विश्वनाथ को निद्रा से जगाया जाता है। ब्रह्म मुहूर्त का यह समय दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण होता है और आरती के साथ शिव के निराकार स्वरूप का साकार रूप में अवतरण माना जाता है। यह आरती मनुष्य जीवन में जागरण का प्रतीक है, जब भीतर की सुप्त क्षमताएँ सक्रिय होती हैं और साधक के लिए सौभाग्य के नए मार्ग खुलते हैं। माना जाता है कि जो भक्त इस आरती के दर्शन करता है, उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आरंभिक सफलता सहज रूप से प्रवाहित होने लगती है।
भोग आरती: जीव के पोषण और समृद्धि का संदेश
दोपहर के समय संपन्न होने वाली भोग आरती जीवन के पोषण और संरक्षण की प्रतीक मानी जाती है। इस समय बाबा को विविध राजसी व्यंजनों का नैवेद्य अर्पित किया जाता है और अन्नपूर्णा एवं विश्वनाथ का अद्वैत रूप प्रकट होता है। यह आरती हमें याद दिलाती है कि संसार का प्रत्येक जीव पोषण और सुरक्षा का अधिकारी है। भक्त मानते हैं कि इस आरती में सम्मिलित होने से अन्न-धन की कमी दूर होती है और जीवन में स्थिरता व समृद्धि का प्रवाह बढ़ता है। यह वह क्षण है जब शिव संसार के पोषक रूप में अपनी कृपा बरसाते हैं।
संध्या आरती: नकारात्मक ऊर्जा के शमन का पावन अवसर
सूर्यास्त की बेला में होने वाली संध्या आरती शिव के वैराग्य और शक्ति का दिव्य संगम है। मंदिर परिसर डमरू, शंख और घंटों की ध्वनि से गूंज उठता है, मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव का स्मरण कर रहा हो। यह आरती दिनभर संचित नकारात्मक ऊर्जा के शमन का साधन मानी जाती है। साधक के भीतर का अंधकार हटने लगता है और मनोदशा में शांति व संतुलन का उदय होता है। यह आरती क्षणिक जीवन को अनंत के स्पर्श से जोड़ देती है, जहाँ शिव की ऊर्जा हर विकार का अंत कर देती है।
श्रृंगार आरती: शिव के सौंदर्य और आनंद का उत्सव
रात्रि के प्रारंभ में संपन्न होने वाली श्रृंगार आरती वह अवसर है जब बाबा विश्वनाथ को विविध पुष्पों, सुगंधों और अलंकारों से सजाया जाता है। यह आरती शिव के आनंदमय, उत्सवप्रिय और सौंदर्य से परिपूर्ण स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव कराती है। भक्त मानते हैं कि इस आरती के दर्शन से परिवार में सुख, मानसिक शांति और जीवन में सौंदर्य की अनुभूति बढ़ती है। यह वह समय है जब शिव की कृपा प्रसन्नता के रूप में साधक पर बरसती है और मन में उत्सव का प्रकाश भर देती है।
शयन आरती: विलय और शांति की परम अवस्था
रात्रि के अंतिम प्रहर में होने वाली शयन आरती वह पवित्र क्षण है जब महादेव को विश्राम के लिए ले जाया जाता है। शिव तांडव स्तोत्र या शांति मंत्रों की गूँज के बीच मंदिर में ब्रह्मांडीय मौन उतरने लगता है। यह आरती सृष्टि के शांत चरण का प्रतीक है, जहाँ सभी गतिविधियाँ शिव में विलीन हो जाती हैं। शयन आरती का दर्शन मृत्यु भय को समाप्त करने वाला माना गया है, क्योंकि यह हमें उस सत्य से परिचित कराता है कि अंततः हर जीव शिव में ही समाहित होता है और वहीं से उसकी नई यात्रा प्रारंभ होती है।
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