प्रयागराज माघ मेले के सबसे पावन स्नान पर्व मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा संगम नोज तक पालकी (बग्घी) से जाने की जिद ने स्थिति को तनावपूर्ण बना दिया। प्रशासन द्वारा लगातार पैदल जाने का अनुरोध किए जाने के बावजूद वे अपने निर्णय पर अड़े रहे। लगभग तीन घंटे तक चली इस खींचतान ने संगम क्षेत्र की व्यवस्थाओं को प्रभावित किया।
बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश और भीड़ प्रबंधन संकट
विवाद के दौरान शंकराचार्य समर्थकों द्वारा बैरिकेडिंग तोड़ने का प्रयास किए जाने की बात भी सामने आई। उस समय संगम क्षेत्र में स्नानार्थियों की अत्यधिक भीड़ मौजूद थी और केवल पैदल आवागमन की अनुमति थी। ऐसे में किसी भी प्रकार के वाहन का प्रवेश प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती बन गया, जिससे भगदड़ की आशंका भी उत्पन्न हुई।
दूसरे नोटिस में क्या-क्या आरोप
माघ मेला प्राधिकरण द्वारा 18 जनवरी को जारी दूसरे नोटिस में कहा गया है कि आपात परिस्थितियों के लिए आरक्षित पांटून पुल नंबर-2 पर लगे बैरियर को तोड़ा गया। बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के संगम अपर मार्ग से बग्घी पर सवार होकर भीड़ के साथ आगे बढ़ा गया, जबकि ध्वनि विस्तारक यंत्रों और वायरलेस सेट से बार-बार वाहन निषिद्ध होने की घोषणा की जा रही थी।
संगम क्षेत्र की संवेदनशीलता और प्रशासन की चिंता
नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि संगम नोज क्षेत्र स्नानार्थियों की सुरक्षा और आवागमन की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील था। लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी के बीच वाहन ले जाने का प्रयास भीड़ प्रबंधन को पूरी तरह चरमरा सकता था। मेला प्रशासन के अनुसार, इस स्थिति में भगदड़ और बड़े पैमाने पर जनहानि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता था।
मेला व्यवस्था बाधित होने का आरोप
प्राधिकरण ने यह भी कहा है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के इस कृत्य से मौनी अमावस्या के दिन माघ मेला की समूची व्यवस्था प्रभावित हुई। लाखों स्नानार्थियों को सुरक्षित स्नान कराकर वापस भेजने में प्रशासन को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिससे सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ।
शंकराचार्य पद को लेकर सुप्रीम कोर्ट का संदर्भ
नोटिस में एक अहम बिंदु यह भी है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा स्वयं को शंकराचार्य बताकर मेले में बोर्ड और प्रचार सामग्री लगाए गए। मेला प्राधिकरण के अनुसार, उनके शंकराचार्य होने पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से रोक लगी हुई है। ऐसे में स्वयं को शंकराचार्य के रूप में प्रस्तुत करना न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आ सकता है।
माघ मेले में प्रवेश पर बैन की आशंका
लगातार जारी नोटिसों और प्रशासन की सख्त टिप्पणी के बाद संकेत मिल रहे हैं कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया, तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के माघ मेला क्षेत्र में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यह मामला अब केवल प्रशासनिक अनुशासन तक सीमित न रहकर धार्मिक परंपरा, न्यायिक आदेश और सार्वजनिक सुरक्षा के त्रिकोण में फंसता नजर आ रहा है।
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