निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट रहे PCS अफसर अलंकार अग्निहोत्री ने UGC नियमों में बदलाव और संत समाज से जुड़े एक घटनाक्रम के विरोध में इस्तीफा देकर योगी सरकार को खुली चुनौती दी थी। इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई तेज हुई और बरेली स्थित ADM कंपाउंड में उनके आवास को चारों ओर से घेरकर व्यावहारिक रूप से ‘हाउस अरेस्ट’ में तब्दील कर दिया गया। बाहर पुलिस और PAC की मौजूदगी ने पूरे इलाके को छावनी जैसा बना दिया है।
ADM कंपाउंड ‘मिनी जेल’ में तब्दील
अलंकार अग्निहोत्री का आरोप है कि उन्हें उनके ही घर में कैदी बना दिया गया है। आवास के बाहर सशस्त्र बलों की तैनाती, आवागमन पर कथित रोक और निगरानी के चलते उन्होंने इसे ‘मिनी जेल’ करार दिया। उनका कहना है कि बिना किसी औपचारिक आदेश के इस तरह की पाबंदियां लोकतांत्रिक व्यवस्था के विपरीत हैं।
बंद गेट के पीछे से मीडिया से गंभीर आरोप
अपने आवास के बंद गेट के भीतर से मीडिया से बातचीत में अलंकार अग्निहोत्री ने बेहद गंभीर दावे किए। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक तंत्र के भीतर मौजूद कुछ सवर्ण और ब्राह्मण अधिकारियों ने उन्हें आगाह किया है कि देर रात उन्हें किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया जा सकता है। उनका आरोप है कि उनके फोन और समर्थकों के नंबर सर्विलांस पर हैं और उनकी आवाज दबाने के लिए जैमर तक लगाए गए हैं।
संवैधानिक अधिकारों के हनन का दावा
अग्निहोत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश में संवैधानिक तंत्र पूरी तरह विफल हो चुका है। उनके अनुसार, उनका फ्रीडम ऑफ मूवमेंट संविधान के अनुच्छेद 19 और राइट टू लाइफ अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित अधिकार हैं, जिन्हें बाधित किया गया है। उन्होंने चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि यदि वे अचानक अनरीचेबल हो जाएं, तो इसे सामान्य न समझा जाए।
सुप्रीम कोर्ट से राष्ट्रपति तक हस्तक्षेप की मांग
PCS अफसर ने दावा किया कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क कर दिया है। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार और राष्ट्रपति से सीधे हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि सामान्य वर्ग अब मानसिक रूप से सरकार से मोहभंग कर चुका है और संवैधानिक मर्यादाएं लगातार कमजोर होती जा रही हैं।
प्रशासनिक व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक कार्रवाई, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अफसरों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर सरकार कानून-व्यवस्था की बात कर रही है, तो दूसरी ओर एक PCS अधिकारी द्वारा लगाए गए आरोप व्यवस्था की पारदर्शिता और संवैधानिक संतुलन पर गहरी बहस को जन्म दे रहे हैं।
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