प्रयागराज में मौनी अमावस्या के दौरान रथ से स्नान को लेकर शुरू हुआ विवाद अब धार्मिक मर्यादा, प्रशासनिक अधिकार और राजनीति के चौराहे पर खड़ा नजर आ रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अनशन और प्रशासनिक नोटिस ने इस मामले को सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि संवैधानिक और सियासी बहस में बदल दिया है।
उमा भारती का तीखा हस्तक्षेप
मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ के माध्यम से इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने योगी सरकार से टकराव के बजाय समाधान की उम्मीद जताई, लेकिन साथ ही स्पष्ट कहा कि किसी शंकराचार्य से प्रमाण मांगना प्रशासन की मर्यादा और अधिकार क्षेत्र के बाहर है। उनका यह बयान भाजपा के भीतर वैचारिक असहजता को उजागर करता है।
प्रशासनिक अधिकार बनाम धार्मिक परंपरा
उमा भारती ने जोर देकर कहा कि शंकराचार्य की मान्यता तय करने का अधिकार केवल शंकराचार्य परंपरा, विद्वत परिषद और धर्माचार्यों को है, न कि प्रशासनिक अधिकारियों को। यह टिप्पणी सीधे तौर पर राज्य प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े करती है और धार्मिक स्वायत्तता की बहस को केंद्र में ले आती है।
भाजपा के भीतर उभरते मतभेद
इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दे दिया है कि भाजपा के भीतर इस मुद्दे पर एकमत नहीं है। जहां एक ओर राज्य सरकार का रुख सख्त दिख रहा है, वहीं उमा भारती जैसी वरिष्ठ नेता का अलग स्वर पार्टी के अंदर वैचारिक विभाजन की ओर इशारा करता है। इससे विपक्ष को भी सरकार पर हमला बोलने का नया मौका मिल गया है।
अन्य शंकराचार्यों का समर्थन और बढ़ता दबाव
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अन्य तीन शंकराचार्यों का समर्थन मिलने के बाद मामला और संवेदनशील हो गया है। इससे सरकार पर नैतिक और सामाजिक दबाव बढ़ा है कि वह इस विवाद को टकराव की बजाय संवाद के जरिए सुलझाए। धार्मिक समुदाय में भी इस विषय को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखी जा रही है।
सियासी असर और आगे की राह
यह विवाद केवल एक व्यक्ति या पद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह धर्म, सत्ता और संविधान के संबंधों पर व्यापक सवाल खड़े कर रहा है। उमा भारती की टिप्पणी ने साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक विमर्श में और गहराएगा, और सरकार के लिए संतुलन साधना एक बड़ी चुनौती होगी।
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