नई दिल्ली: भारत में रम के सबसे लोकप्रिय ब्रांडों में शामिल Old Monk इन दिनों अपने स्वाद या लोकप्रियता नहीं, बल्कि लेबलिंग से जुड़े विवाद को लेकर चर्चा में है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने इस ब्रांड की कुछ किस्मों के नाम, फ्लेवर और बोतल पर लिखे दावों पर सवाल उठाए हैं। इस मामले में कंपनी का दावा है कि बिक्री पर रोक और विवाद के कारण उसे 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है। सवाल यह है कि आखिर दशकों से बाजार में बिक रही Old Monk पर अब आपत्ति क्यों उठाई गई है? क्या मामला रम बनाने के तरीके से जुड़ा है या फिर बोतल पर दी गई जानकारी से? आइए, जानते हैं Old Monk और FSSAI के बीच विवाद की पूरी कहानी।
क्या है Old Monk और क्यों है इतनी लोकप्रिय?
Old Monk भारत में रम का एक जाना-माना ब्रांड है, जिसकी शुरुआत साल 1954 में हुई थी। इसे मोहन मीकिन कंपनी बनाती है और यह दशकों से भारतीय शराब बाजार में अपनी पहचान बनाए हुए है। गहरे रंग की बोतल, खास स्वाद और वनीला जैसी खुशबू इसकी प्रमुख पहचान मानी जाती है। इस ब्रांड की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे पहचान दिलाने के लिए बड़े पैमाने पर विज्ञापन पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। ग्राहकों के बीच इसकी पहचान काफी हद तक लोगों की पसंद और मौखिक प्रचार से बढ़ी। Old Monk भारतीय निर्मित विदेशी शराब यानी IMFL की श्रेणी में आती है। हालांकि, इन दिनों ब्रांड की चर्चा इसके स्वाद से ज्यादा उत्पाद की श्रेणी और लेबल पर लिखी जानकारी को लेकर हो रही है।
Old Monk का इतिहास: 1855 में शुरू हुई थी कारोबार की कहानी
Old Monk की कहानी आजादी से पहले शुरू हुए एक शराब कारोबार से जुड़ी है। साल 1855 में स्कॉटिश कारोबारी एडवर्ड अब्राहम डायर ने हिमाचल प्रदेश के कसौली में एक ब्रुअरी शुरू की थी। उस समय यहां मुख्य रूप से ब्रिटिश सैनिकों की मांग को ध्यान में रखकर बीयर बनाई जाती थी। आगे चलकर यह कारोबार डायर मीकिन ब्रुअरीज के नाम से जाना जाने लगा। वर्ष 1949 में नरेंद्र नाथ मोहन ने इस कारोबार का अधिग्रहण किया और इसका नाम बदलकर मोहन मीकिन रख दिया। इसके कुछ वर्षों बाद, 1954 में Old Monk रम बाजार में उतारी गई। इस ब्रांड की शुरुआत का श्रेय वेद रतन मोहन को दिया जाता है, जबकि उनके भाई कपिल मोहन ने इसे लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। धीरे-धीरे Old Monk ने भारतीय बाजार में अपनी अलग पहचान बनाई और इसकी लोकप्रियता पीढ़ियों तक बनी रही।
क्या है Old Monk और FSSAI के बीच पूरा विवाद?
Old Monk से जुड़ा विवाद इसकी कुछ किस्मों की पहचान और उन्हें तैयार करने के तरीके पर केंद्रित है। FSSAI ने सवाल उठाया है कि कुछ उत्पादों में न्यूट्रल स्पिरिट में रम का फ्लेवर मिलाकर उन्हें रम के नाम से बेचा जा रहा है। नियामक की आपत्ति का मुख्य मुद्दा यह है कि उत्पाद की वास्तविक प्रकृति और उसकी लेबलिंग के बीच स्पष्टता होनी चाहिए। यदि किसी पेय में रम जैसा स्वाद या खुशबू अलग से मिलाई गई है, तो उसके नाम से ग्राहक को भ्रम नहीं होना चाहिए। इसके अलावा, बोतलों पर लिखे ‘7 Years Old Blended’ और ‘Very Old Vatted’ जैसे दावों पर भी सवाल उठाए गए हैं। नियामक के अनुसार, यदि मिश्रण में नई स्पिरिट भी शामिल है, तो पूरे उत्पाद को सात साल पुराना बताने से ग्राहक भ्रमित हो सकते हैं। इसी विवाद के बाद महाराष्ट्र में कंपनी की खोपोली इकाई से जुड़ी कुछ किस्मों की बिक्री पर रोक लगाए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, कंपनी ने इस कार्रवाई को चुनौती दी है और अब मामला कानूनी लड़ाई तक पहुंच गया है।
आखिर सामान्य रम और फ्लेवर्ड रम में क्या अंतर है?
रम और फ्लेवर्ड रम के बीच अंतर को समझना इस पूरे विवाद की सबसे अहम कड़ी है। सामान्य तौर पर रम गन्ने के शीरे या गन्ने के रस से तैयार की जाती है और इसके उत्पादन में किण्वन तथा आसवन जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। इसके विपरीत, फ्लेवर्ड स्पिरिट में स्वाद और खुशबू बढ़ाने के लिए अलग से फ्लेवर मिलाया जा सकता है। हालांकि, केवल फ्लेवर मिलाने से किसी पेय की कानूनी श्रेणी अपने आप तय नहीं हो जाती। इसके लिए यह देखना जरूरी होता है कि उत्पाद में किन चीजों का इस्तेमाल किया गया है और संबंधित नियम उस उत्पाद को किस नाम से बेचने की अनुमति देते हैं। यही वजह है कि FSSAI ने Old Monk की कुछ किस्मों के नाम और उनकी प्रकृति पर सवाल उठाए हैं। नियामक चाहता है कि उत्पाद की पहचान बोतल पर इस तरह स्पष्ट हो कि ग्राहक उसे सामान्य रम समझने की गलती न करें। ऐसे में विवाद केवल स्वाद का नहीं, बल्कि उत्पादन प्रक्रिया, उत्पाद की श्रेणी और नियमों के पालन का भी है।
शराब की बोतल पर लिखी जानकारी क्यों होती है जरूरी?
किसी भी पैक किए गए उत्पाद की तरह शराब की बोतल पर दी गई जानकारी ग्राहकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। लेबल के जरिए ग्राहक को पता चलता है कि उत्पाद किस श्रेणी का है और उसमें किन सामग्रियों या प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया गया है। शराब के मामले में उम्र, मिश्रण और उत्पाद के नाम से जुड़े दावे भी खरीदारी के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। यदि बोतल पर किसी उत्पाद को सात साल पुराना बताया जाता है, तो ग्राहक यह मान सकता है कि उसमें इस्तेमाल की गई पूरी स्पिरिट निर्धारित अवधि तक पुरानी रही है। लेकिन अगर मिश्रण में नई स्पिरिट भी शामिल है, तो इस दावे का अर्थ स्पष्ट होना जरूरी है। इसी तरह, यदि किसी पेय में रम का फ्लेवर मिलाया गया है, तो उसकी सही श्रेणी और नाम की जानकारी ग्राहक को भ्रम से बचा सकती है। लेबलिंग से जुड़े नियमों का उद्देश्य ग्राहकों को उत्पाद के बारे में सही जानकारी देना और भ्रामक दावों पर रोक लगाना है। Old Monk का मौजूदा विवाद भी इसी सवाल से जुड़ा है कि बोतल पर लिखी जानकारी नियमों के अनुरूप है या नहीं।
कंपनी ने अपने बचाव में क्या कहा?
Old Monk बनाने वाली कंपनी ने बिक्री पर रोक लगाने की कार्रवाई को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कंपनी का दावा है कि इस विवाद के कारण उसे 500 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। उसके लिए यह मामला केवल कुछ उत्पादों की बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्रांड की प्रतिष्ठा और बाजार में उसकी मौजूदगी से भी जुड़ा है। दूसरी ओर, FSSAI का जोर उत्पाद की सही पहचान और लेबलिंग से संबंधित नियमों के पालन पर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नियामक चाहता है कि संबंधित उत्पादों पर ‘Rum’ के बजाय ‘Rum-like’ यानी ‘रम जैसा’ शब्द इस्तेमाल किया जाए, ताकि ग्राहकों को पेय की प्रकृति के बारे में स्पष्ट जानकारी मिल सके। हालांकि, कंपनी की दलीलों और नियामक की आपत्तियों पर अंतिम स्थिति कानूनी प्रक्रिया के नतीजे से स्पष्ट होगी। फिलहाल, इस मामले में अदालत के फैसले पर नजर बनी हुई है। आने वाले समय में इसका असर न केवल Old Monk की कुछ किस्मों की बिक्री पर, बल्कि शराब उद्योग में उत्पादों की श्रेणी और लेबलिंग से जुड़े नियमों पर भी पड़ सकता है।
Old Monk विवाद का बिक्री पर क्या पड़ सकता है असर?
Old Monk लंबे समय से भारतीय बाजार में अपनी पहचान बनाए हुए है, इसलिए इसकी कुछ किस्मों की बिक्री पर रोक का असर कंपनी के कारोबार पर पड़ सकता है। यदि विवाद लंबा खिंचता है, तो संबंधित उत्पादों की उपलब्धता और बिक्री प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, ग्राहकों के बीच उत्पाद की पहचान को लेकर भ्रम पैदा होने से ब्रांड की छवि पर भी असर पड़ने की आशंका है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि बिक्री संबंधी प्रतिबंध कितने समय तक लागू रहते हैं और अदालत क्या फैसला सुनाती है। यदि कंपनी को राहत मिलती है, तो संबंधित किस्मों की बिक्री को लेकर स्थिति बदल सकती है। दूसरी ओर, यदि नियामक की आपत्तियां बरकरार रहती हैं, तो कंपनी को लेबलिंग या उत्पाद की श्रेणी में बदलाव करना पड़ सकता है। फिलहाल, 500 करोड़ रुपये से ज्यादा के नुकसान का आंकड़ा कंपनी का दावा है, इसे अंतिम रूप से तय नुकसान नहीं माना जाना चाहिए। इस विवाद का आगे का घटनाक्रम ही स्पष्ट करेगा कि Old Monk के कारोबार और बाजार में उसकी स्थिति पर कितना असर पड़ता है।