इंदौर. गुना का रहने वाला एमबीए का छात्र एप्लास्टिक एनीमिया से पीड़ित हो गया और गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुंचा. परिवार के लोग इलाज के लिए इंदौर के सुपर स्पेशलिएटी हास्पिटल लेकर पहुंचे, घोड़े के खून से निकाली गई एंटी बॉडी इंजेक्शन से उसकी जान बचाई गई. इस थैरेपी एटीजी (एंटी थाइमोसाइट ग्लोब्युलिन थैरेपी) से पहली बार इस अस्पताल में उपचार किया गया. दो हफ्ते पहले दी गई थैरेपी के बाद अब पेशेंट पूरी तरह स्वस्थ है.
गुना निवासी 23 वर्षीय एमबीए के छात्र के शरीर में एप्लास्टिक एनीमिया के चलते खून की मात्रा काफी कम हो गई थी. स्थिति यह थी कि हीमोग्लोबिन 2 ग्राम, प्लेटलेट्स 6 हजार तथा डब्ल्यूबीसी 1 हजार हो गए थे.उसके नाक और कान से ब्लीडिंग हो रही थी.
दिल्ली से पहुंचाया इंदौर
छात्र का गुना, भोपाल और फिर दिल्ली में इलाज चला. चूंकि एप्लास्टिक एनीमिया का मामला था और एटीजी थैरेपी से इलाज 10 लाख रु. से ज्यादा में होता है. परिजन यह वहन करने की स्थिति में नहीं थे, इसके चलते दिल्ली के डॉक्टरों ने परिजन को इंदौर के सुपर स्पेशलिएटी हॉस्पिटल रैफर किया.
इसलिए नहीं किया बोन मैरो ट्रांसप्लांट
डॉ. अक्षय लाहोटी (क्लिनिकल हेमेटोलॉजी) के अनुसार मरीज का पहले बोन मैरो ट्रांसप्लांट प्लान किया गया. इसके लिए उसकी बहन का हूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन चेक किया जो मैच नहीं हुआ. दरअसल बोन मेरो ट्रांसप्लांट किया जाता तो कुछ जीन्स का मैच करना जरूरी होता है.
यह है एटीजी थैरेपी
छात्र के परिजन से चर्चा कर सहमति के बाद एटीजी थैरेपी (इन्फ्युजन) प्लान की गई. इसमें 5 मिमी के इंजेक्शन को नॉर्मल सलाइन में मिलाकर 12 से 14 घंटे तक दिया जाता है. उक्त इंजेक्शन की कीमत 12 हजार रु है. ऐसे 10 इंजेक्शन उसे चार दिनों में लगाए गए. इसके अलावा दवाइयां, इलाज, थैरेपी के चार्जेस अतिरिक्त होते हैं.
ऐसा होता है एप्लास्टिक एनीमिया
एप्लासिटक एनीमिया के पेशेंट्स में खून के पदार्थ को बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह बंद हो जाती है. इससे शरीर में खून की कमी, डब्ल्यूबीसी की कमी, प्लेटलेट्स की कमी हो हो जाती है और काफी कमजोरी आ जाती है. इसके साथ ही शरीर के अन्य अंगों से ब्लीडिंग होती है. छात्र को भी कभी कान से तो कभी नाक से ब्लीडिंग होती थी.इसके साथ ही मुंह में छाले व क्लॉट हो गए थे.
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